Tuesday, February 1, 2022
भारतीय संस्कृति पर भारी बाज़ार| Materialism is exploiting the Indian culture.
हमारे ऋषियों ने मनुष्य के जीवन को 25 - 25 वर्ष के चार भागों में बांट दिया था। जिनमें से प्रथम ब्रह्मचर्य, दूसरा ग्रहस्थ, तीसरा वानप्रस्थ और चौथा संन्यास। ब्रह्मचारी का अर्थ है ब्रह्म जैसी चर्या। सिर्फ वीर्य को धारण करना ब्रह्मचर्य नहीं है। ब्रम्हचर्य मनुष्य जीवन की नींव है। ब्रह्म जैसी चर्या यानि स्वयं की तरफ जाती हुई चेतना का नाम है- ब्रह्मचर्य और दूसरों की तरफ जाती हुई चेतना का नाम कामवासना है। 25 वर्ष के लिए हम #युवकों को भेजते थे गुरुकुल में ताकि भीतर की तरफ बहना सीखें। एक बार आप इस #ऊर्जा को संभाल ले फिर आपको तय करना है कि इसे जारी रखना है या गृहस्थ जीवन में प्रवेश करना है। लेकिन एक वैश्विक षड्यंत्र के तहत न सिर्फ इसकी निंदा की गई बल्कि बाजार ने ऐसी व्यवस्था की कि मनुष्य कामनाओं के पीछे जीवन भर भागता रहे। बाजार और विज्ञापनों की मृग मरीचिका ने एक ऐसा वातावरण तैयार किया कि मनुष्य जीवन भर बाहर भागता रहे लेकिन स्वयं से मिलने की कभी फुर्सत न मिले। क्षणिक सुखों के पीछे भागने वाले मनुष्य की इंद्रियां ब्रह्मचर्य की महिमा को समझने में सक्षम नहीं हो पाती। अतः जो समझ में आता है वही सत्य लगता है।. Benefits of Neem
आज बाजार, विज्ञापन, फिल्में, सोशल मीडिया, पोर्न कंटेन्ट के माध्यम से जो अश्लीलता हजारों दरवाजों से परोसी जा रही है वहीं युवाओं के मन को चंचल और दुर्बल बनाने का काम कर रही हैं। " संगात्संजायते कामः" जिसके परिणाम स्वरूप शारीरिक एवं मानसिक रूप से दुर्बल होते युवा तरह-तरह की बीमारियों का शिकार हो रहे है । नई पीढ़ी में बढ़ते तलाक , सन्तानहीनता, शुक्राणुओं की कमी के मामले परिणाम के रूप में देखे जा सकते हैं।. Manage your cholesterol
आज जब आप यह लेख पढ़ रहे हैं यौवन दुनिया से विदा हो रहा है। कामुकता परोसने का बाजार का षड्यंत्र आईवीएफ और सरोगेसी के रूप मे फल फूल रहा है। योग से भी ब्रह्मचर्य को बहिष्कृत करके सिर्फ भोगने के साधन के रूप में परोसा जा रहा है। ऐसे युग में जहां चर्चित होना ही एकमात्र लक्ष्य हो। भले ही सार्वजनिक मंच से अपनी ब्रा की चर्चा करनी पड़े या ऐतिहासिक महापुरुषों से स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने का घृणित प्रयास हो । वहां आपको तय करना है कि क्या दुनिया को डिमांड और सप्लाई के हिसाब से ही चलने दिया जाए? या हर युग में आने वाली अच्छाईयों और बुराइयों की समय के साथ समीक्षा की जाए और उनमें सुधार की संभावना तलाशी जाय? लोग अपनाएं या न अपनाएं अच्छी बातों की चर्चा जरूर होनी चाहिए। ताकि आने वाली पीढ़ियां यह न कहें कि हमें इस बारे में बताया ही नहीं गया।. Live for 100 years
Tuesday, July 27, 2021
भारतीय संस्कृति में आत्मनिर्भरता
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| Representational Picture |
Saturday, December 12, 2020
बाजार डर बेचता है?
Wednesday, January 4, 2017
Tuesday, July 7, 2015
DU Appreciation.
http://www.du.ac.in/du/uploads/Gandhi%20Bhawan/30062015_GB.pdf
My special talk on #yoga & #Ayurveda is being appreciated by #DelhiUniversity website follow link refer page 4.
Thanks to all.
Friday, June 26, 2015
दिल्ली में आयोजित हुई योग एवं आयुर्वेद कार्यशाला सम्पन्न
Date: June 01, 2015in: हेल्थ0 Comments103 Views
दिल्ली में आयोजित हुई योग एवं आयुर्वेद कार्यशाला सम्पन्न Current Crime+1Current Crime0
कुलपति श्री दिनेश सिंह, पोफेसर अनीता शर्मा, प्रो चक्रवर्ती सहित अनेक शिक्षा विद एवं छात्रों ने भाग लिया
नई दिल्ली। मुख्या वक्त के रूप में बोलते हुए डॉ लक्ष्मीकान्त त्रिपाठी ने कहा कि आयुर्वेद दुनिया की सबसे प्राचीन चिकित्सा पध्यति है इसमे न सिर्फ रोगो के बारे में , बल्कि रोगो से बचाव उनके उपचार अवं दीर्घायु के बारे में विस्तार से बताया गया है आहार निद्रा अवं बृह्मचर्य के नियमो का पालन करके मनुष्य १०० वर्ष तक स्वस्थ्य अवं निरोग रह सकता है. आयुर्वेदा का अर्थ है- आयु= जीवन , वेद = ज्ञान यानि जीवन को निरोग दीर्घायु अवं सार्थक बनाने का जो भी ज्ञान है वह सब हमें आयुर्वेदा से मिलता है। (latest health hindi news in delhi ncr)
आयुर्वेदा के अनुसार हमारा शरीर ३ दोषो से मिलकर बना है १ वात २ पित्त ३ कफ इन तीनो का समान यानि संतुलित होना ही स्वास्थ्य कहलाता है और इनका असंतुलित यानि दूषित होना ही बीमारियो का कारन बनता है इसीलिए इन्हे त्रिदोष कहा जाता है.
जिनकी वायु प्रकृति है उन्हें जोड़ो में दर्द सर दर्द पेट में गैस जल्दी होतीहै उन्हें गरिष्ठ बासी भोजन नहीं लेना चाहिए से और ताज़ा भोजन लेना चाहिए व्यायाम सैर और प्राणायाम करना चाहिए पित्त प्रकृति है उन्हें ज्वर जलन चक्कर फोड़े जल्दी होते हैं
अतः उन्हें चाय सिगरेट शराब काफी धुप अग्नि का सेवन नहीं करना चाहिए पानी और फलो का सेवन ज्यादा करना चाहिए जिनकी कफ प्रकृति है उन्हें सर्दी खांसी सूजन मोटापा पाइल्स जल्दी होती है अतः उन्हें दही आइसक्रीम मैदा मिठाई पकवान कम खाना चाहिए.
योग और आयुर्वेद में बहुत समानता है दोनों का उद्गम भारत में हुआ दोनों मनुष्य की शुद्धि अवं विकास पर जोर देते है ( प्रशन्न आत्मेन्द्रियमनश्च ) आयुर्वेदा शरीर की शुद्धि पंचकर्म से और योग ख्टकर्म से करता है अष्टांग आयुर्वेद के भी हैं और अष्टांग योग भी है.
आयुर्वेद में आहार- यानि खाना क्या खाएं कब खाए कैसे खाएं और विहार- यानि दिनचर्या अवं व्यायाम पर बहुत जोर देता है और योग भी
युक्ताहार विहारस्य युक्तचेस्टस्य कर्मसु.
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवतु दुःखहा। ।
यानि समान सिद्धांतों और निर्देशो के साथ आयुर्वेद और योग हमारे जीवन को सार्थक स्वस्थ अवं निरोग बनाने का वचन देते हैं.
आज की भागदौड़ तनाव प्रतिश्पर्धा भरी जिंदगी में जब शुगर, ह्रदय रोग, अवं डिप्रेशन महामारी का रूप ले रहे है आयुर्वेद और योग मनुष्य जाति के लिए वरदान है और यह सौभाग्य का विषय है की सरकार और सारे विश्व में आज इसके महत्व को पहचाना गया है लेकिन उससे भी जरूरी है की हम सब प्रकृति के प्रति जागरूक हों और जिन ५ तत्वों से हमारा निर्माण हुआ है पृथ्वी जल वायु अग्नि आकाश उन्हें नष्ट होने से प्रदूषित होने से बचाएं तभी आशा रखें की हम भी बचे रहेंगे।
कार्यशाला का समापन करते हुए विवि के कुलपति श्री दिनेश सिंह ने सभी से योग अवं आयुर्वेद को अपनाने का आह्वान किया उन्होंने कहा की डॉ लक्ष्मी कान्त त्रिपाठी में निष्काम सेवा की प्रवृति है और उनकी पुस्तक ‘जीते रहो’ मानव जीवन का स्पष्ट मैप है।
Tuesday, June 9, 2015
योगो भवति दुःखहा।
२९ मई २०१५ को योग एवं आयुर्वेद पर कार्यशाला सम्पन्न हुई जिसमें कुलपति श्री दिनेश सिंह पोफेसर अनीता शर्मा प्रो चक्रवर्ती सहित अनेक शिक्षा विद एवं छात्रों ने भाग लिया.
मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए डॉ लक्ष्मीकान्त त्रिपाठी ने कहा कि आयुर्वेद दुनिया की सबसे प्राचीन चिकित्सा पध्यति है इसमे न सिर्फ रोगो के बारे में ,
बल्कि रोगो से बचाव उनके उपचार अवं दीर्घायु के बारे में विस्तार से बताया गया है आहार निद्रा अवं बृह्मचर्य के नियमो का पालन करके मनुष्य १०० वर्ष तक स्वस्थ्य अवं निरोग रह सकता है. आयुर्वेदा का अर्थ है- आयु= जीवन , वेद = ज्ञान यानि जीवन को निरोग दीर्घायु अवं सार्थक बनाने का जो भी ज्ञान है वह सब हमें आयुर्वेदा से मिलता है।
आयुर्वेदा के अनुसार हमारा शरीर ३ दोषो से मिलकर बना है १ वात २ पित्त ३ कफ इन तीनो का समान यानि संतुलित होना ही स्वास्थ्य कहलाता है और इनका असंतुलित यानि दूषित होना ही बीमारियो का कारन बनता है इसीलिए इन्हे त्रिदोष कहा जाता है.
जिनकी वायु प्रकृति है उन्हें जोड़ो में दर्द सर दर्द पेट में गैस जल्दी होतीहै उन्हें गरिष्ठ बासी भोजन नहीं लेना चाहिए से और ताज़ा भोजन लेना चाहिए व्यायाम सैर और प्राणायाम करना चाहिए पित्त प्रकृति है उन्हें ज्वर जलन चक्कर फोड़े जल्दी होते हैं
अतः उन्हें चाय सिगरेट शराब काफी धुप अग्नि का सेवन नहीं करना चाहिए पानी और फलो का सेवन ज्यादा करना चाहिए जिनकी कफ प्रकृति है उन्हें सर्दी खांसी सूजन मोटापा पाइल्स जल्दी होती है अतः उन्हें दही आइसक्रीम मैदा मिठाई पकवान कम खाना चाहिए.
योग और आयुर्वेद में बहुत समानता है दोनों का उद्गम भारत में हुआ दोनों मनुष्य की शुद्धि अवं विकास पर जोर देते है ( प्रशन्न आत्मेन्द्रियमनश्च ) आयुर्वेदा शरीर की शुद्धि पंचकर्म से और योग ख्टकर्म से करता है अष्टांग आयुर्वेद के भी हैं और अष्टांग योग भी है.
आयुर्वेद में आहार- यानि खाना क्या खाएं कब खाए कैसे खाएं और विहार- यानि दिनचर्या अवं व्यायाम पर बहुत जोर देता है और योग भी
युक्ताहार विहारस्य युक्तचेस्टस्य कर्मसु.
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवतु दुःखहा। ।
यानि समान सिद्धांतों और निर्देशो के साथ आयुर्वेद और योग हमारे जीवन को सार्थक स्वस्थ अवं निरोग बनाने का वचन देते हैं.
आज की भागदौड़ तनाव प्रतिश्पर्धा भरी जिंदगी में जब शुगर, ह्रदय रोग, अवं डिप्रेशन महामारी का रूप ले रहे है आयुर्वेद और योग मनुष्य जाति के लिए वरदान है और यह सौभाग्य का विषय है की सरकार और सारे विश्व में आज इसके महत्व को पहचाना गया है लेकिन उससे भी जरूरी है की हम सब प्रकृति के प्रति जागरूक हों और जिन ५ तत्वों से हमारा निर्माण हुआ है पृथ्वी जल वायु अग्नि आकाश उन्हें नष्ट होने से प्रदूषित होने से बचाएं तभी आशा रखें की हम भी बचे रहेंगे।
कार्यशाला का समापन करते हुए विवि के कुलपति श्री दिनेश सिंह ने सभी से योग अवं आयुर्वेद को अपनाने का आह्वान किया उन्होंने कहा की डॉ लक्ष्मी कान्त त्रिपाठी में निष्काम सेवा की प्रवृति है और उनकी पुस्तक 'जीते रहो' मानव जीवन का स्पष्ट मैप है।
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अमृता प्रीतम जी की कलम से
उनकी पत्रिका नागमणि में प्रकाशित यादगार पल
एवं इमरोज़ जी का बनाया रेखाचित्र 1998
विस्तृत विवरण उनकी कालजयी कृति 'काया के दामन में'
Tuesday, June 7, 2011
swami ramdev is also responsible for result!
बाबा का हाथ छोटा नुकीला अध्यात्मिक श्रेणी का है , भाग्य रेखा प्रारंभ में मोटी है-
साधारण परिवार में जन्मा लेकर संघर्षपूर्ण जीवन बिताने के बोजूद बाबा राम देव बहुत योग्य लोकप्रिय दयालु एवं बाल स्वाभाव के है. उनकी सरलता ने उन्हें ऊँचा मुकाम दिया है. उनके व्यक्तित्वा में संतो से अधिक तेज और राजनेताओ से भी अधिक जनप्रियता एवं सर्व स्वीकार्यता है.
बाबा कि हथेली में सूर्य क्षेत्र बलवान है, सूर्य रेखा भी लम्बी है- लेकिन गुरु , शनि कि और झुका है- चन्द्र अति विकसित है-
आज देश का कोई भी नेता इतनी भीड़ नहीं जुटा सकता है. वे बहुत अच्छे teamleader है.
उनके अंदर आत्मा प्रशंशा एवं लोककल्यान का भाव है. लेकिन नेत्रत्वा के गुणों का भाव है.
बाबा दिवस्वप्नादर्शी एवं घोर महत्वाकंशी हैं. बाबा कि सफलता के पीछे उनके ज्ञान कि कम विज्ञापन की भूमिका ज्यादा है,.
ह्रदय रेखा लम्बी है, हेड लाइन सीधी है- लाइफ लाइन से जुडी है, रातोंरात सब क़र जाना चाहते है -
वे आदर्शवादी है और सबका भला करना चाहते है लेकिन कैसे करें यह पता नहीं है.
भावनाओ कि नदी में बह जाते हैं.
अंगूठा लम्बा लेकिन पतला है ,तर्क शक्ति बेहतर है बोलते ज्यादा हैं सुनते कम है
वे देशप्रेम एवं राष्ट्र प्रेम का नाम लेकर बहुत बडा परिवर्तन लाना चाहते हैं , लेकिन उनको पूरा करने के लिए जीस साहस एवं त्याग कि जरूरत होती है उसकी उनमे कमी है. वे नाम भगत सिंह जैसा करना चाहते हैं लेकिन परिणाम से डरते हैं.( अपने अनुयायियों को अकेले छोड़कर, महिलाओ के कपडे पहनकर भाग जाना , और कहना मेरा एन्कोउन्टर हो जाता? अगर संकल्प लिया हैं तो त्याग भी करना होता है, सन्यासी को जीवन से कैसा मोह.)
४२ वे साल भाग्य में परिवर्तन सन्यास (शनि) से संसार ( गुरु ) कि ओर-
बाबा के जीवन में बहुत बडा change आया है वे धर्मगुरु से जननेता में बदल चुके है. उनको जल्दी अपनी भूमिका स्पष्ट करनी होगी अन्यथा
इमागे ख़राब होगी और जनाधार खिसकेगा. निष्कासित एवं परित्यक्ता लोगो को अपना सलाहकार बना उन्हें महंगा पड़ा.
हथेली में गुरुवालय है और ह्रदय और मष्तिष्क रेखा के बीच दूरी सामान है ( रोयल लाइफ)-
उनके हाथ में खुद किंग बन्ने का योग नहीं है लेकिन आगे भी वे किंग बनाते रहेंगे..उनके सहयोग से सरकारे बनेगी और बिगड़ेगी.
अगर पूरा विश्लेषण किया जाये तो ४ जून के बाद बाबा का demotion हुआ है . उन्होंने सहस विवेक और धैर्य से काम लिया होता तो उनकी तस्वीर और चमकीली दिखाई देती. आगे उन्हें सुरक्षा एवं स्वस्थ्य के पत\रति सतर्क रहना होगा.
बाबा रामदेव के उज्जवल भविष्य एवं प्रगति कि शुभकामनाओ के साथ .
सादर,
Saturday, July 10, 2010
आपके मन में होता है PET KE रोगों का उदगम!
यह तकलीफ कहाँ से अ रही है। आपके मन से..... जी हाँ! आपका मन ही रोग और आरोग्य का कारन है। ज्यादा चिंता करने वालो को पेट में मरोड़ होती है। दुसरे से जलने वालो को पेट में गैस बन जाती है, अल्सर हो जाते है, हमेशा पेट दर्द का रहना यानि अनिर्णय और अनिश्चितता के वातावरण में व्यक्ति जी रहा है। और जब तक मन से यह स्थिति नहीं जाती लक्षण समाप्त नहीं होते भले ही कितनी जांचें कराएँ और दवाईया खाएं।
कब्ज़ा कौई बीमारी नहीं है जो लोग कंजूस होते है उन्हें कब्ज हो जाती है हर चीज को पकड़ने की आदत हो जाती है। फिर उसे छूटने के लिए कितना चूरन खाते हैं।
आदमी को खासकर पेट के रोगों में इलाज से ज्यादा एदुकतिओन और काउंसेलिंग की जरूरत है। जब आदमी अपनी भावनाओ को किसी के साथ शेयर नहीं करता तो भीतर गैस बन जाती है। और एन चीजो का कोई इलाज नहीं सिवाय एन ग्रंथियों से मुक्त होने के।
मन की हलचल और ऊहापोह से शारीर में वायु का संग्तुलन बिगड़ जाता है यानि प्रकोप हो जय और यही प्रकुपित वायु लाब्म्बे दिगेस्तिवे सिस्टम की स्पीड बाdha या घटा देती है। उसी से उदार रोगों का जन्मा होता है।
Friday, June 4, 2010
कैसा हैं आपका चेहरा ?
अंडाकार चेहरा- जिस मनुष्य का चेहरा अंडाकार होता है वह आदर्शवादी , भावुक, बेकार की बातें सोचने वाला
कल्पनाशील , दिन में सपने देखने वाला होता है.इन्हे आपने आपको थोडा प्रक्टिकल बनाने का प्रयास करना चहिये
तो जीवन में सुख सफलता ज्यादा मिलेगी।
वर्गाकार चेहरा- जिस मनुष्य का चेहरा देखने में चोकोर लगता है ऐसे लोग बहुत उत्साही ,प्रक्टिकल और प्रगतिशील होते है। ये हार मानकर नहीं बैठते है बल्कि जितने के लिए बार-२ उठ खड़े होते है.इसलिए इनके पास
धन की कमी नहीं रहती है.समस्या तब अति है जब ये काम को बार -२ बदलते हैं.
तिकोना चेहरा-यह बहुत धूर्त और अवसरवादी होते है, इनके अंदर फल का इंतज़ार करने का धैर्य नहीं होता है
अतः ये कच्चे फ्रल ही खा जाते है अर्थात दूसरो को, धोखा देते है। ध्यान और धर्मं के पालण से सुधर होता है.
गोल, चेहरा -
जिन लोगो का चेहरा गोल होता है उन्हें शीशा देखने से फुरशत नहीं मिलती है, ये सोचते है की यदि मेरा चेहरा और अच्छा होता तो ठीक रहता इन्हे याद रखना चाहिए की सौंदर्य चेहरे में नहीं व्यवहार में होता है.इन्हे बेऔटी,
फैशन और क्रेअटिवे प्रयासों में ज्यादा सफलता मिलती है।
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हस्त -रेखाएं और आप!...........
उत्तर- हमारे शाश्त्रो में लिखा है क़ि -
आयुहा कर्म च वित्तामा च विद्या निधानामेवा च
पंचैतानी विलिख्यान्ति गर्भाश्थैवा देहिनः।
अर्थात- संसार में आने वाले मनुष्य की आयु कितनी होगी, कर्म क्या करेगा धन कितना कमाएगा विद्या कितनी होगी और मृत्यु किस कारण से होगी? यह पंचा बातें माँ के गर्भ में ही निर्धत्रित हो जाती है और हथेली में लिख जाती हैं इसलिए हथेली को इश्वेर द्वारा बने गयी जन्मकुंडली कहते हैं।
प्रश्न- कई बार उपाय करने के बोजूद सफलता नहीं मिलती?
उत्तर- हाँ ! एक तो समस्या से सम्बंधित उपाय ही बताने चाहिए छोटे अवं सरल उपाय जो काम करते हैं वे भरी भरकम खर्चीले उपाय भी नहीं कर पाते। उपायों के बोजूद अगर जीवन में वांछित सफलता न मिले तो मद्य मांस भ्रून्हात्या परनारी या पुरुष का सेवन करना छोड़ दें।
प्रश्न- हाथ देखने में पारंगत होने का क्या उपाय है?
उत्तर- हाश्तारेखा की पुश्ताके पढ़कर हाथ देखना ऐसा ही है जैसे पलने रुन्वय पर दौड़ रहा हो लेकिन रुन्वय में तो बस भी दौड़ सकती है सवाल है जमीं छोड़कर उड़ने का , बस और प्लेने के बीच द्फार्क उड़ने का है और उड़ान वाही ले सकता है जो संयमी अवं साधक हो। गुरु अवं इष्ट की कृपा प्राप्त की हो। पारंगत होने के लिए विषय के अध्ययन के साथ इश्वेरिया कृपा बहुत जरूरी है।
प्रश्न-आयुर्वेद अवं हाश्तारेखा विज्ञानं में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर- आयुर्वेद आपको बतात है की एस समय आपको क्या रोग है और उसका क्या इलाज है जबकि हाश्तारेखा विज्ञानं से पता चलता है की आने वाले समय में आपको किस तरह के रोग हीओ सकते हैं। किस प्रकार अपनी जीवन shaillymen परिवर्तन करके खानपान ठीक करके तथा आयुर्वेदिक औषधियों का सेवन करके आप भावी रोगों से बचाओ कर सकते हैं।
प्रशन- हथेली दिखाने से क्या लाभ होते है ?
उत्तर - अगर मनुष्य को पता चल जाये की उसका स्वभाव कैसा है ,कौन सा काम उसे सफलता देगा किस क्षेत्र
में वह नाम अवं धन कमाएगा कौन से रोग उसे जीवन में घेर सकते है अच्हे समय वह कैसे ज्यादा सफलताये प्राप्त करे और बुरे समय में कैसे अपने को सीमित कर के दुखों से बचे ? तो निशित रूप से उसका जीवन ज्यादा सार्थक अवं सफल होगा और यह मार्ग दर्शन हस्तरेखाओ के अध्यन से प्राप्त किया जा सकता है ।
प्रश्न-हाथ कितने समय के अंतरअल में दिखाना चाहिए ?
उत्तर - प्रत्येक तीन माह पश्चात् हथेली की प्रभाव रेखाए बदल जाती हैं जिन्हें देखकर आपके कर्म अवं उसके परिणाम का डाटा बेस तैयार करके मार्गदर्शन किया जा सकता है।
प्रश्न- सामास्य समाधान में उपायों की भूमिका पर प्रकाशज डालिए?
उत्तर- संकटकाल में मनुष्य को चार चीजो की मदद लेनी चाहिए
मंत्र-यानि आपने से बड़ो की सलाह
ओषधि- व्याधियो के विनाश के लिए
तप- जो कष्ट आया है उसे इश्वेर की इच्छा समझकर सहन करना
दान- कई बार धन संग्रह किए दौरान दोषों का भी संग्रह हो जाता है दान से मन कर्म वचन में निर्मलता अति है
इसी प्रकार भक्ति पूजा अनुष्ठान रत्नाधारण करने से परेशानियाँ कम हो जाती है।
इश्वेर कल्याण करें!
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परोपकाराय पुण्याय पापस्य पर्पिदानाम!...........
एक समय की बात है देवरिषि नारद भगवन नारायण का गुणगान करते हुए प्रथ्वी लिक में विचरण कर रहे थे , अचानक उनकी नज़र वेदव्यास पर पड़ी जो पुस्तकों के बीच ध्यानस्थ होकर बैठे हुए थे। नारद जी ने उन्हें प्रणाम की या और पूछा की आप इतनी पुश्ताके पढ़ रहे हैं क्या अभी भी आपको अध्ययन की जरूरत है? वेदव्यास जी ने कहा, नहीं नारद जी ये तो अठारह पुराण है जिनकी मैंने रचना की है यह मेरा सौभाग्य है की आप यहाँ पधारेमेरी समझ से अगर आप इनका अध्ययन कर ले तो मेरा परिश्रम सार्थक हो जाये आप अच्छे वक्ता होने के साथ -२ गतिशील भी हैं अतः इनके प्रचार प्रसार में सहायता कर सकते हैं।
नारद जी बोले इतनी किताबें देखकर ही मुझे बेचैनी हों रही है मैं ज्यादा देर तक एक जगह बैठ नहीं सकता अतः सभी पुरानो को पढना मेरे लिए तो संभव नहीं है, हाँ एक उपाय हो सकता है की आप मुझे संपूर्ण पुरानो का सार बता दें तो मैं उसे तीनो लोको में प्रचलित कर दूंगा फिर जिसे क्विस्द्तार से जानना होगा वह पुराणोंन को पढ़ेगा
पहले तो वेदव्यास जी बहुत निराश हुए की मैंने इतना समय अवं श्रम लगाकर पुराणों की रचना कीं और नारद जी पढने को राजी नहीं हैं फिर उन्होंने सोचा की नारद जी से अच्छा कोई प्रचारक तो मिल नहीं सकता इसलिए पुराणों का सार ही इन्हे बता दिया जाये.
अतः व्यास जी बोले ------
अश्तादशा पुरानेशु व्यशाश्य वाच्नाद्वायाम
परोपकाराय पुण्याय पापस्य पर्पिदानाम!
अर्थात इन १८ पुराणों में दो ही बातें मुख्या हैं - दूसरो पर उपकार करना दया अवं प्रेम रखना ही पुण्य है धर्मं है और किसी को पीड़ा पहुचना दुखी करना सबसे बड़ा पाप है !
आज जब धर्मं के नाम पर लोग बहस आडम्बर विवाद अवं युध पर उतारू हो जातवे हैं उनके लिए धर्मं का मौलिक अर्थ और वेदा पुरनियो का सार समझने का इससे सरल तरीका नहीं हो सकता , लोगो को भी यह समझना चाहिए की धर्मं पुण्य संयम पवित्रता अवं संतोष से रहित जीवन सुखी नहीं हो सकता है . धन कमाना अच्छी बात है लेकिन धन का उपयोग सिर्फ निजी सुविधाओ अवं भोग के लिए करना शारीरिक अवं मानसिक विकार पैदा करता है, जीवन में सुख अवं संतोष संसाधनों के संग्रह में नहीं बल्कि बाँटने में प्राप्त होता है।
इसीलिए हमरे ऋषियों ने समझाया की ' तें त्यक्तेन भुंजीथा' अर्थात -जिसने त्याग दिया उसने भोग लिया। जैसे आपकी जेब में १० रूपया है तो उन्हें भोगने के लिए पहले त्यागना होगा नोट को बिना त्यागे आप भोग नहीं कर सकते हैं।इसलिए भोग में जब आप दूसरो को शामिल कर लेते हैं तो उसका सुख कई गुना बढ़ जाता है.
प्राचीन काल से ही यज्ञ भंडारे भोज का यही उद्देश्य था , अकेले में खाए गए स्वादिष्ट व्यंजनों से वह तृप्ति मिल ही नहीं सकती जो सादे सामूहिक भोज से प्राप्त होती है, आज जब महानगरो में भीड़ और शोर बहुत बढ़ रहा है कही एकांत क्ल्होजना मुश्किल है फिर भी मनुष्य अकेला होता जा रहा है। उसकी न कोई सुनने वाला है न उसकी तरफ कोई देखने वाला। धन संसाधन अवं सुख सुविधाओ का धेर्ण लगाने की जैसे होड़ मची है व्यक्ति की पहचान सिर्फ उसके पद अवं पैसे से होती है लोग उदासीन होते जा रहे हैं, अवसाद्ग्रश्ता होकर आत्महत्या कर रहे हैं ऐसे में जितनी जल्दी यह बात समझ ले तो अच्छा है की-हम भूखे को अपना भिओजन दे सकें, और प्यासे को पानी पिला सके पीड़ित व्यक्ति को अपना समय दे सकें तो हम इश्वेर को प्रशन्ना करने के लिए अलग से किसी यज्ञ या अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं पड़ेगी जैसा की वेदव्यास जी ने लिखा है-
अन्नादो जल्दश्च्युएब्व अतुराश्य चिकित्सकः।
त्रायन्ते स्वर्गमायान्ति विना यज्ञेन भारत ॥

