Wednesday, January 4, 2017





आदिकाल से ही मनुष्य   के मन में आने वाले समय यानि भविष्य को जानने की जिज्ञासी रही है।  हर मनुष्य जानना चाहता है की कल क्या होगा? या आज जो मैं कर्म कर रहा हूँ उसका परिणाम क्या होगा ? कर्म तो हर आदमी करता है लेकिन फल कब मिलेगा ? इन्ही सवालों का जवाब हमें मिलता है ज्योतिषशास्त्र  में। 

ज्योतिष  वेद का तीसरा नेत्र है। ज्योतिषीय  गणनाएं शुद्ध गणित पर आधारित हैं जिनका लोहा आज के वैज्ञानिक भी मानते हैं।  चाहे चंद्रग्रहण , सूर्य ग्रहण जैसी खगोलीय घटनाएं हो या किसी का व्यक्तिगत जन्माङ्क  बना हो हमारे विद्वान ज्योतिषाचार्यों द्वारा बनाये गए  पंचांङग  कभी भूल चूक नहीं करते है। 
  लेकिन जब किसी  मनुष्य को अपना जन्म समय ज्ञात न हो तो जन्मकुंडली बनाना  एवं उसके बारे में कुछ बता पाना  लगभग असंभव हो जाता है। ऐसा केवल तभी होता है जब लोग केवल  जन्मकुंडली को ही ज्योतिष समझ लेते हैं।  जन्मकुंडली के अलावा हस्तरेखा विज्ञानं है जो आपके हाथ की लकीरों में ही आपकी जन्मकुंडली दिखा देता है। फिर अंक विज्ञानं है और मुखाकृति विज्ञानं के अलावा अनेक माध्यम हैं जिनसे आपके भाग्य की झलक मिल जाती है. लेकिन हस्तरेखा विज्ञानं आज अपनी उन्नत अवस्था में है और आपके जीवन की हर घटना का विस्तृत व्योरा देने में सक्षम है। आपका स्वभाव , आपका स्वास्थ्य, आपके सम्बन्ध कैसे रहेंगे ? आप अपना व्यवहार कैसा रखें ? समय  समय पर अपना हाथ  देखकर या  दिखाकर समय  के अनुसार  चलना  हम सीख सकते हैं। इसीलिए   हमारे  ऋषियों ने सुबह सबसे  पहले अपना हाथ देखने की शिक्षा दी-


 कराग्रे बसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती। 
करमूले तु  गोविंद प्रभाते कर दर्शनम। ।

क्योंकि हमारे हथेली के रंग एवं प्रभाव रेखाओ में होने वाले परिवर्तन हमारे आने वाले  समय  में  सुख एवं दुखों के संकेत लिए होते हैं और जो इन संकेतों को समय रहते समझ लेते हैं वे दुखों से काफी हद तक बचने में कामयाब हो जाते हैं। 

ज्योतिष को सिर्फ भविष्य बताने का माध्यम समझना ऐसी ही भूल होगी जैसी जीवन का उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना है। जीवन में सेवा, सत्संग,  परोपकार, ध्यान, संगीत , प्रकृति , चित्रकारी और पर्यटन को छोड़कर  सिर्फ पैसा पैसा कमाना, पैसे के पीछे भागना, पैसे के लिए सम्बन्ध बनाना , पैसे के लिए यात्रा करना , केवल पैसे का ही चिंतन करना मनुष्य को वास्तविक सुख से दूर ले जाता है।
  ज्योतिष हमें सिखाता है की अगर अच्छे फल पाना है तो पहले अच्छे कर्म करने होंगे।  अच्छे सम्बन्ध बनाने होंगे सबके हितों का ध्यान रखना होगा चाहे वे मित्र हों, रिश्तेदार हो, पडोसी हों, संसार हों ,जिव जंतु, पशु पक्षी, चाँद तारे , नदियां पर्वत  सबसे संवाद बनाये रखकर सबके हित की बात सोचकर ही सबमे परमात्म भाव रखकर ही हम इस संसार में सुखी रह सकते हैं। इसलिए हमने रिश्तों को ग्रहों से जोड़ा सूर्य पिता, चन्द्रमा माता, मंगल भाई, बुध बहन , तुलसी , पीपल,  गौमाता , चिड़िया ,चींटी , नदी, पर्वत आकाश सबकी पूजा करना सबको प्रशन्न  रखना सिखाया इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है मनुष्य के सुख से रहने का। 

ज्योतिष में मुहूर्त और नक्षत्र का चिंतन बहुत वैज्ञानिक है ।लेकिन उससे भी ज्यादा महत्व इस बात का है कि इससे हमें टाइम मैनेजमेंट और अनुशाशन सीखने को मिलता है। अगर हमे कोई  छूट देदे की अगले सप्ताह में कभी भी इंटरव्यू के लिए आ जाना तो शायद पूरा सप्ताह निकल जाये और हमें समय न मिले लेकिन अगर पंडित जी बता दें की सोमवार सुबह १०.१० से १०. ५५ के बीच शुभ मुहूर्त है इस बीच इंटरव्यू देने से सम्पूर्ण  सफलता मिलेगी तो हमारा उत्साह बढ़ जाता है, आलस्य ख़त्म हो जाता है हम ज्यादा एकाग्रता से काम करते हैं। इसी तरह हमारी बुरी आदतें 
ग्रहों को प्रशन्न करने के लिए किये गए उपायों, नियमो के दौरान छूट  जाती हैं।  

 चर्चा  चाहे रेडियो में चले या टीवी  में, मैं हमेशा कहता हूँ की ज्योतिष की ताकत को अभी तक  पहचाना नहीं गया. यह ऐसी पवित्र विद्या है जो न सिर्फ मनुष्य को नैतिक पतन से बल्कि सामाजिक बुराईयों से दूर रखने की क्षमता रखती है।  ज्योतिष के सही प्रयोग से एक अच्छे व्यक्ति एवं श्रेष्ठ समाज का निर्माण संभव है। बच्चों का हाथ देखकर बचपन में ही आगाह किया जा सकता है की इन्हें किन बुराईयों से बचाना है या इनमे कौन से गुण हैं जो इन्हें विश्वव्यापी शोहरत दिलाएंगे ? हमारे शोध जिस गति से जारी हैं मुझे आशा है की जिस तरह हम बच्चों के आँखों की जाँच करते हैं, दाँतों की जाँच करते हैं उसी प्रकार उनके हाथों की जाँच कराएँगे और उन्हें बेहतर इंसान बनाएंगे। 

ज्योतिष का सर्वाधिक नुक्सान ३  तरह के लोगो ने किया है एक वे जिन्होंने ज्योतिष का बिना अध्ययन किये ही उसे अन्धविश्वास मान लिया और दुसरे वे जिन्होंने अध्ययन तो किया लेकिन 
उसके बारे में लोगो समझाया नहीं , संकोची और अंतर्मुखी  स्वाभाव होने के कारन  तथ्यों को समाज के सामने सही तरीके से प्रस्तुत नहीं कर पाए  .  और तीसरे वे जो केवल एक दो किताबें पढ़कर   अपना व्यवसाय बढ़ाते रहे और  रत्न, ताबीज़ छल्ले,  जैसे प्रोडक्ट बेचते रहे। ज्योतिष उपासना का विषय है  बिना संयम, सेवाभावना  एवं इष्टकृपा के इसके गूढ़ रहस्यों को नहीं समझा  जा सकता है। यद्यपि सच्चे उपासकों को भौतिक आवश्यकताएं  भी पूरी  हो जाती है लेकिन यह उसका उद्देश्य नहीं होता। 

ज्योतिष का आकाश  बहुत बृहत एवं विशाल है ज्योतिष कहता है की हम पूरे ब्रम्हांड से जुड़े हैं कुछ भी अलग नहीं है "यत पिंड तत ब्रह्माण्डे । बाहर  सारे ब्रम्हांड में जो कुछ भी है  वह सब हमारे अंदर भी है अतः बाहर  संसार में किया गया कोई भी असत्य, अन्याय, विध्वंश से हम अछूते नहीं रह सकते अतः हम अपने मन, वचन, कर्म को सही दिशा दें तभी हम उज्जवल भविष्य की रचना कर सकते हैं। सारे संसार के नोट भी  हमारे अकाउंट में आ जाएँ तो भी हम सुखी नहीं हो सकते हैं अगर कोई  मनुष्य भूखा सो रहा है हमारे  आसपास।

, ज्योतिष कहती है कि अगर दुखी हो 
 शनि से पीड़ित हो तो जाकर भूखे को भोजन कराओ।  यानि संतुलन लाओ असंतुलन से दुखी हो। तराजू एक तरफ झुक जा रहा है इसलिए पीड़ा है अतः दुसरे पलड़े में कुछ रखो संतुलन आएगा तो सुख आएगा  यही तो शनि का काम है न्याय करना। न्याय के देवता शनि हैं तराजू लेकर खड़े हैं।  यह तो सामाजिक संतुलन की बात है अगर आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो ज्योतिष कहती है 
कि तुम्हे चिंता की जरूरत नहीं है अपना कर्म करते रहो यह संसार जिस शक्ति से चल रहा है वह तुम्हे भी संभाल लेगी तुम कुछ भी नहीं हो जो शक्ति सूर्य के ताप को नियंत्रित रखती है और समुद्र को  सीमाओं में रखती है पहाड़ों को स्थिर रखती है और आसमान से  विशाल ग्रहों और तारों को तुम्हारे ऊपर गिरने नहीं देती सम्हाल लेती है वही शक्ति तुम्हे भी संम्हाल लेगी। तुम शांति से अपना काम करो , होशपूर्ण बने रहो और जीवन का आनन्द लो और उस शक्ति (परमात्मा ) का धन्यवाद व्यक्त करो। 

Tuesday, July 7, 2015

DU Appreciation.

http://www.du.ac.in/du/uploads/Gandhi%20Bhawan/30062015_GB.pdf

My special talk on #yoga & #Ayurveda is being appreciated by #DelhiUniversity website follow link refer page 4.
Thanks to all.

Friday, June 26, 2015

दिल्ली में आयोजित हुई योग एवं आयुर्वेद कार्यशाला सम्पन्न


Date: June 01, 2015in: हेल्थ0 Comments103 Views
दिल्ली में आयोजित हुई योग एवं आयुर्वेद कार्यशाला सम्पन्न Current Crime+1Current Crime0 
कुलपति श्री दिनेश सिंह, पोफेसर अनीता शर्मा, प्रो चक्रवर्ती सहित अनेक शिक्षा विद एवं छात्रों ने भाग लिया

नई दिल्ली। मुख्या वक्त के रूप में  बोलते हुए डॉ लक्ष्मीकान्त  त्रिपाठी ने कहा कि आयुर्वेद दुनिया की सबसे प्राचीन चिकित्सा पध्यति  है इसमे न सिर्फ रोगो के बारे में , बल्कि रोगो से बचाव उनके उपचार अवं दीर्घायु के बारे में विस्तार से बताया गया है आहार निद्रा अवं बृह्मचर्य के नियमो  का पालन करके मनुष्य १०० वर्ष तक स्वस्थ्य अवं निरोग रह सकता है. आयुर्वेदा का अर्थ है- आयु= जीवन , वेद = ज्ञान  यानि जीवन को निरोग दीर्घायु अवं सार्थक बनाने का जो भी ज्ञान है वह सब हमें आयुर्वेदा से मिलता है। (latest health hindi news in delhi ncr)
आयुर्वेदा के अनुसार हमारा शरीर ३ दोषो से मिलकर बना है १ वात  २ पित्त ३ कफ    इन तीनो का समान यानि संतुलित होना ही स्वास्थ्य कहलाता है और इनका असंतुलित यानि दूषित होना ही बीमारियो का कारन बनता है इसीलिए इन्हे त्रिदोष कहा जाता है.
जिनकी वायु प्रकृति है उन्हें जोड़ो में दर्द सर दर्द पेट में गैस जल्दी होतीहै उन्हें गरिष्ठ बासी भोजन नहीं लेना चाहिए  से और ताज़ा भोजन लेना चाहिए  व्यायाम  सैर और प्राणायाम करना चाहिए  पित्त प्रकृति है उन्हें ज्वर जलन चक्कर फोड़े  जल्दी होते हैं
अतः उन्हें चाय सिगरेट शराब काफी धुप अग्नि का सेवन नहीं करना चाहिए  पानी और फलो का सेवन ज्यादा करना चाहिए  जिनकी कफ प्रकृति है उन्हें सर्दी खांसी सूजन मोटापा पाइल्स जल्दी होती है अतः उन्हें दही आइसक्रीम मैदा मिठाई पकवान कम खाना चाहिए.

योग और आयुर्वेद में बहुत समानता है दोनों  का उद्गम भारत में हुआ दोनों मनुष्य की शुद्धि अवं विकास पर जोर देते है ( प्रशन्न आत्मेन्द्रियमनश्च ) आयुर्वेदा शरीर की शुद्धि  पंचकर्म से और योग ख्टकर्म से करता है अष्टांग आयुर्वेद के भी हैं और अष्टांग योग भी है.
आयुर्वेद में आहार- यानि खाना क्या खाएं कब खाए कैसे खाएं और विहार- यानि दिनचर्या अवं व्यायाम पर बहुत जोर देता है और योग भी
युक्ताहार विहारस्य युक्तचेस्टस्य कर्मसु.
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवतु दुःखहा। ।

यानि समान सिद्धांतों और निर्देशो के साथ आयुर्वेद और योग हमारे जीवन को सार्थक स्वस्थ अवं निरोग बनाने का वचन देते हैं.
आज की भागदौड़ तनाव प्रतिश्पर्धा भरी जिंदगी में जब शुगर, ह्रदय रोग, अवं डिप्रेशन महामारी का रूप ले रहे है आयुर्वेद और योग मनुष्य जाति के लिए वरदान है और यह सौभाग्य का विषय है की सरकार और सारे विश्व में आज इसके महत्व को पहचाना गया है लेकिन उससे भी जरूरी है की हम सब प्रकृति के प्रति जागरूक हों और जिन ५ तत्वों से हमारा निर्माण हुआ है पृथ्वी जल वायु अग्नि आकाश  उन्हें नष्ट  होने से प्रदूषित होने से बचाएं तभी आशा रखें की हम भी  बचे रहेंगे।
कार्यशाला का समापन करते हुए विवि के कुलपति श्री दिनेश सिंह ने सभी से योग अवं आयुर्वेद को अपनाने का आह्वान किया उन्होंने कहा की डॉ लक्ष्मी कान्त त्रिपाठी में निष्काम सेवा की प्रवृति है और उनकी पुस्तक ‘जीते रहो’  मानव जीवन का स्पष्ट मैप है।

Tuesday, June 9, 2015

योगो भवति दुःखहा।

२९ मई २०१५ को  योग एवं आयुर्वेद पर कार्यशाला सम्पन्न हुई जिसमें कुलपति श्री दिनेश सिंह पोफेसर अनीता शर्मा प्रो चक्रवर्ती सहित अनेक शिक्षा विद एवं छात्रों ने भाग लिया. 

मुख्य वक्ता के रूप में  बोलते हुए डॉ लक्ष्मीकान्त  त्रिपाठी ने कहा कि आयुर्वेद दुनिया की सबसे प्राचीन चिकित्सा पध्यति  है इसमे न सिर्फ रोगो के बारे में ,
बल्कि रोगो से बचाव उनके उपचार अवं दीर्घायु के बारे में विस्तार से बताया गया है आहार निद्रा अवं बृह्मचर्य के नियमो  का पालन करके मनुष्य १०० वर्ष तक स्वस्थ्य अवं निरोग रह सकता है. आयुर्वेदा का अर्थ है- आयु= जीवन , वेद = ज्ञान  यानि जीवन को निरोग दीर्घायु अवं सार्थक बनाने का जो भी ज्ञान है वह सब हमें आयुर्वेदा से मिलता है।
आयुर्वेदा के अनुसार हमारा शरीर ३ दोषो से मिलकर बना है १ वात  २ पित्त ३ कफ    इन तीनो का समान यानि संतुलित होना ही स्वास्थ्य कहलाता है और इनका असंतुलित यानि दूषित होना ही बीमारियो का कारन बनता है इसीलिए इन्हे त्रिदोष कहा जाता है.
जिनकी वायु प्रकृति है उन्हें जोड़ो में दर्द सर दर्द पेट में गैस जल्दी होतीहै उन्हें गरिष्ठ बासी भोजन नहीं लेना चाहिए  से और ताज़ा भोजन लेना चाहिए  व्यायाम  सैर और प्राणायाम करना चाहिए  पित्त प्रकृति है उन्हें ज्वर जलन चक्कर फोड़े  जल्दी होते हैं
अतः उन्हें चाय सिगरेट शराब काफी धुप अग्नि का सेवन नहीं करना चाहिए  पानी और फलो का सेवन ज्यादा करना चाहिए  जिनकी कफ प्रकृति है उन्हें सर्दी खांसी सूजन मोटापा पाइल्स जल्दी होती है अतः उन्हें दही आइसक्रीम मैदा मिठाई पकवान कम खाना चाहिए.

योग और आयुर्वेद में बहुत समानता है दोनों  का उद्गम भारत में हुआ दोनों मनुष्य की शुद्धि अवं विकास पर जोर देते है ( प्रशन्न आत्मेन्द्रियमनश्च ) आयुर्वेदा शरीर की शुद्धि  पंचकर्म से और योग ख्टकर्म से करता है अष्टांग आयुर्वेद के भी हैं और अष्टांग योग भी है.
आयुर्वेद में आहार- यानि खाना क्या खाएं कब खाए कैसे खाएं और विहार- यानि दिनचर्या अवं व्यायाम पर बहुत जोर देता है और योग भी
युक्ताहार विहारस्य युक्तचेस्टस्य कर्मसु. 
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवतु दुःखहा। ।

यानि समान सिद्धांतों और निर्देशो के साथ आयुर्वेद और योग हमारे जीवन को सार्थक स्वस्थ अवं निरोग बनाने का वचन देते हैं.
आज की भागदौड़ तनाव प्रतिश्पर्धा भरी जिंदगी में जब शुगर, ह्रदय रोग, अवं डिप्रेशन महामारी का रूप ले रहे है आयुर्वेद और योग मनुष्य जाति के लिए वरदान है और यह सौभाग्य का विषय है की सरकार और सारे विश्व में आज इसके महत्व को पहचाना गया है लेकिन उससे भी जरूरी है की हम सब प्रकृति के प्रति जागरूक हों और जिन ५ तत्वों से हमारा निर्माण हुआ है पृथ्वी जल वायु अग्नि आकाश  उन्हें नष्ट  होने से प्रदूषित होने से बचाएं तभी आशा रखें की हम भी  बचे रहेंगे।
कार्यशाला का समापन करते हुए विवि के कुलपति श्री दिनेश सिंह ने सभी से योग अवं आयुर्वेद को अपनाने का आह्वान किया उन्होंने कहा की डॉ लक्ष्मी कान्त त्रिपाठी में निष्काम सेवा की प्रवृति है और उनकी पुस्तक 'जीते रहो'  मानव जीवन का स्पष्ट मैप है।
    
--

अमृता प्रीतम जी की कलम से

उनकी पत्रिका नागमणि में प्रकाशित यादगार पल

एवं इमरोज़ जी का बनाया रेखाचित्र 1998

विस्तृत विवरण उनकी कालजयी कृति 'काया के दामन में'

Saturday, June 15, 2013

अच्छी सोच ही प्रार्थना और अच्छा कर्म ही पूजा है
                    --डा लक्ष्मीकान्त त्रिपाठी

आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।
पञचैतानि विलिखयन्ते गर्भस्थस्येव देहिनाः।।
अर्थात मां के गर्भ के दौरान ही हाथ की लकीरों के रूप में यह अंकित हो जाता है कि मनुष्य की आयु कितनी होगी, धन और विद्या कितनी मिलेगी, कर्म क्या होंगे एवं मृत्यु कैसे होगी। ऐेसी ही हाथ की लकीरों की शक्ति। डा’. लक्ष्मीकांत त्रिपाठी हस्तरेखा विज्ञान में अपनी धाक जमा चुके हैं। उन्होंने अनगिनत लोगों को उनकी हाथ की लकीरों के आधार पर जीवन में सफलता की राह दिखाई है। डा’ त्रिपाठी हस्तरेखा विज्ञान के साथ-साथ आयुर्वेद में भी महारथ रखते हैं। उन्होंने इन दोनों विधाओं में ऐसा तादाम्य स्थापित कर दिया है कि उनके पास आने वाले सभी लोगों को भौतिक सफलताओं के साथ-साथ बेहतर स्वास्थ्य का मंत्र भी मिल जाता है। पेश हैं उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

प्रगतिशील कहे जाने वाले लोग तर्क और विज्ञान के आधार पर हस्तरेखा विज्ञान को ही नकारते हैं। उनकी दलील है कि घटनाओं की भविष्यवाणी कैसे की जा सकती है।
ऐसे विचार उन लोगों के हैं जो ज्योतिष को सिर्फ भविष्यवाणी से जोड़कर देखते हैं। ज्योतिष का यह मतलब कदापि नहीं है कि आप यह बता दें कि अगले क्षण क्या होने वाला है? यह तो सिर्फ परमात्मा ही जानते हैं कि अगले क्षण क्या होने वाला है। जिस प्रकार विज्ञान, चिकित्सा समेत अन्य अनेक क्षेत्रों में सफलता की अपनी सीमाएं, गलती की गुंजाइश है उसी तरह ज्योतिष में भी अनुमान, आकलन में कमी रह जाने की गुंजाइश है। हस्तरेखा विज्ञान मेरा विषय है, यह भविष्य को समझने और उसके अनुरूप अपने आपको तैयार करने की राह बताता है। आपकी हाथ की लकीरों में आपका व्यक्तित्व, आपका अतीत, वर्तमान और भविष्य छिपा है, बस समझने के लिए निरंतर अध्ययन एवं अनुसंधान की आवश्यकता है। मैं यही कोशिश करता हूं कि हाथ की लकीरों के आधार पर किसी व्यक्ति को सफलता की राह बता सकूं, उसकी परेशानियों का निदान कर सकूं।


हस्तरेखा विज्ञान के प्राचीन संदर्भ के बारे में कुछ बताइए।
प्राचीन काल से ही हाथ की लकीरें देखकर मनुष्य के स्वभाव, उसके आने वाले समय, स्वास्थ्य, संपन्नता एवं प्रगति के बारे में जानने की परंपरा रही है। पौराणिक काल में देवर्षि नारद शायद सबसे लोकप्रिय एवं सफल हस्तरेखा विज्ञानी थे। वे स्वयं लोगों के पास जाकर उनकी समस्याओं का समाधान बताते थे। इसके अलावा अग्नि पुराण, गरुण पुराण और पद्य पुराण में भी हाथ की लकीरों एवं मनुष्य के शरीर के लक्षणों के आधार पर उसके गुण-अवगुण जानने की जानकारी मिलती है। प्रत्येक आत्मा जब इस संसार में आती है या यह कहें कि मां के गर्भ में प्रवेश करती है तो उसका पूर्व संचित कर्मों के आधार पर एक संकल्प होता है। उस संकल्प के अनुरूप शिशु के हाथ की लकीरें आकार लेती हैं। रेखाएं दो प्रकार की होती हैं। एक प्रधान रेखाएं जो मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक वही रहती हैं, बदलती नहीं हैं और दूसरी प्रभाव रेखाएं जो समय-समय पर शिक्षा, सोच एवं अच्छे-बुरे कामों के आधार पर बदलती रहती हैं।
आज के परिप्रेक्ष्य में ज्योतिष विधा में क्या बदलाव की जरूरत है? मतलब आज की आधुनिकता में ज्योतिष जैसी प्राचीन विधा को किस तरह जोड़ना चाहेंगे?
समय के साथ समाज बदला, लेकिन ज्योतिष का तरीका नहीं बदला है। ज्योतिष की बुनियाद अभी भी वही है जो सदियों पहले थी। वैसे आज इको फ्रेंडली उपायों की ज्यादा जरूरत है। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश को शुद्ध एवं सुरक्षित रखने की जरूरत है। मनुष्य को ज्यादा से ज्यादा सोशल होने की आवश्यकता है। आज उपभोक्तावाद, पदार्थवाद का युग है। स्वार्थ, दिखावा, ढोंग, आधुनिकता के नाम पर नैतिक पतन बहुत बढ़ गया है। इन हालात में हम अपने सामान्य जीवन का मजा नहीं ले पा रहे हैं। बड़े लोग ही गलत राह पर जा रहे हैं। फिर भी मुझे संतोष मिलता है कि सही परामर्श से लोग लाभान्वित हो रहे हैं। लोग बिना अच्छे कर्म किए अच्छे फल पाना चाहते हैं। मैं उन्हें शुभ संकल्प की ओर आगे बढ़ाता हूं। सात्विकता को बढ़ावा देता हूं। 

ज्योतिष की मूल प्रेरणा क्या है? इसमें किस तरह के बदलाव की आवश्यक है और आप अपने अनुभव के आधार पर क्या संदेश देना चाहेंगे?
ज्योतिष का पहला सूत्र है-चरैवेति चरैवेति अर्थात चलते रहो चलते रहो, रुकना नहीं है। अतः ज्योतिषियों को भी अब देश काल के अनुसार अपने तौर-तरीके बदलने होंगे। पहली बात यह है कि कोई भी ग्रह कभी रुकता नहीं है, चलता ही रहता है। फिर वह चाहे सूर्य हो, चंद्र हो, गुरु हो या राहु हो। सब चल रहे हैं और मनुष्य को भी निरंतर चलते रहने की प्रेरणा दे रहे हैं। अतः रुकने का तो सवाल ही नहीं उठता। हां, किधर चलना है, यह एक सवाल हो सकता है और सफलता के लिए इसका उत्तर जानना जरूरी है। इसका उत्तर हाथ की लकीरों में मिलता है, जन्मांक से मिलता है। गुरु कहता है-शिक्षा, राजनीति, प्रशासन, प्रबंधन आपका क्षेत्र है। बुध कहता है-व्यापार एवं विज्ञान। सूर्य कहता है सृजन। मीडिया, ग्लैमर आपके क्षेत्र हो सकते हैं। शनि व चंद्रमा एकांत चिंतन की ओर उन्मुख करते हैं। शोध और एकांत चिंतन की राह इसी से खुलती है। यानी ये ग्रह भीड़ से अलग कुछ कर दिखाने की आवाज देते हैं। दूसरी बात जो हर ज्योतिषी को ध्यान देने की आवश्यकता है वह यह कि वे ऐसे उपाय बताएं जो पर्यावरण के अनुकूल हो, जो हमारी सृष्टि का संरक्षण करने वाले हों। यानी वायु, ध्वनि एवं जल प्रदूषण रोकने वाले हों। घर के भीतर, विशेषकर पति और पत्नी के बीच तनाव न उत्पन्न हो, सास और बहू के बीच नफरत न फैले। ज्योतिषियों को यह भी ध्यान रखना होगा कि हमारे समाज में युवा संस्कारित हों। इसलिए वे ऐसे उपाय न बताएं जो संस्कारों की महत्ता घटाने वाले हों। अगर हमारे समाज के युवा संस्कारित होंगे तो हमारा समाज अवश्य उन्नति करेगा।
क्या ज्योतिष विद्या या हाथ की लकीरों के अध्ययन से ऐसे चमत्कार भी होते हैं कि कोई भी दुर्भाग्यशाली व्यक्ति भाग्यशाली बन जाए या कोई भी किस्मत वाला आदमी भी दर-दर की ठोकरें खाए?
नहीं, ज्योतिष के नाम पर चमत्कार दिखाने वाले लोगों को लक्ष्य से भटकाते हैं और ऐसे लोगों का शिकार वही बनते हैं जो बिना कर्म किए फल पाना चाहते हैं। इस विधा में निपुणता व्यक्ति की शिक्षा, तप, अभ्यास, त्याग और सेवा की भावना में निहित है। चमत्कार जैसा कुछ भी नहीं है। जिस तरह साइकिल-कार चलाना अथवा हवाई जहाज उड़ाना सीखने के लिए प्रशिक्षण, अभ्यास और अनुभव की जरूरत होती है ठीक उसी तरह हस्तरेखा विज्ञान से यह जाना जा सकता है कि किस समय कौन सा निर्णय सही होगा। हाथ की रेखाएं ईश्वर द्वारा बनाई गई जन्मकुंडली हैं। आपके जीवन का राजमार्ग आपकी रेखाओं के रूप में आपकी हथेली पर अंकित है। यह एक ऐसा मैप है जिससे न केवल आप अपनी मंजिल के बारे में जान सकते हैं, बल्कि वहां तक पहुंचने का सही प्लान भी तैयार कर सकते हैं।  
आप अपने खुद के यादगार अनुभवों के बारे में बताइए। खासकर उन अवसरों के बारे में जब आपको अपनी भविष्यवाणी सच साबित होने पर संतोष का अनुभव हुआ हो।
मेरे लिए ऐसे अवसरों की गिनती करना कठिन है, क्योंकि मैं रोज ही अनगिनत लोगों से मिलता हूं। उनके अपने अनुभव के आधार पर यह कह सकता हूं कि मैं अपने उद्देश्य यानी लोगों को उनकी मंजिल तक पहुंचाने, उन्हें सही राह दिखाने को पूरा करने की दिशा में ही काम कर रहा हूं। मेरे लिए यही संतोष काफी है।
बहुत से लोग कहते हैं कि हमने ज्योतिष की ढेरों किताबें पढ़ी हैं, लेकिन जब भाग्य बतातें हैं तो वह सही नहीं होता।
ढेरों किताबें पढ़ लेने से कोई ज्योतिषी नहीं बन जाता। सच तो यह है कि ऐसे अधिकांश लोग ज्योतिष का इस्तेमाल अपने हितों को पूरा करने के लिए करते हैं। जो लोग लोग ज्योतिष की आत्मा से परिचित हैं वे कभी यह दावा नहीं करेंगे कि मैं सब कुछ बता सकता हूं कि कल क्या होने वाला है? दरअसल जिन लोगों ने ज्योतिष के बारे में अधकचरा ज्ञान हासिल किया था उन्होंने ही इस विधा की गरिमा गिराने का काम किया है। हस्तरेखा विज्ञान ज्योतिष से कुछ भिन्न है। हमें इसके अंतर को समझना होगा। हस्तरेखा विज्ञान में भविष्य का आकलन हाथों की लकीरों के जरिये किया जाता है। महत्वपूर्ण है उस सूत्र को पकड़ना जो हाथों की लकीरों में छिपा है।
क्या आपको कभी यह भय नहीं महसूस होता कि अगर आपकी कोई भविष्यवाणी गलत साबित हो गई तो इसका कैसा प्रभाव पडे़गा। 
नहीं, मुझे कभी इसका भय नहीं रहा, क्योंकि मैं हस्तरेखा विज्ञान की ताकत से परिचित हूं। जाने-अनजाने अनेक लोग समय-समय पर मेरी परीक्षा लेते रहे हैं। आपको एक वाकया बताता हूं। टेलीविजन चैनल स्टार न्यूज पर सूर्यग्रहण को लेकर एक महाबहस चल रही थी। उस बहस में ज्योतिष से जुड़े हुए लोग भी थे और विज्ञान व तर्कशास्त्र से जुड़े लोग भी। इस महाबहस के दौरान विज्ञान और तर्कशास्त्र के लोग एक प्रकार से ज्योतिष विधा का ही निरादर कर रहे थे। महाबहस के दौरान एक ऐसा समय भी आया जब एंकर दीपक चौरसिया ने वैज्ञानिकों और तर्कशास्त्रियों को संतुष्ट करने के लिए मुझसे अपने जीवन के बारे में अनेक ऐसी चीजें पूछीं जिनके बारे में सिर्फ वही जानते थे। यह लाइव महाबहस पूरे देश में देखी जा रही थी। मैं तब भी भयभीत नहीं हुआ और उनके हाथों की लकीरों के आधार पर उनके सवालों के जवाब देता रहा। सभी जवाब सही थे। खुद दीपक चौरसिया ने इसकी पुष्टि की। कहने का मतलब यह है कि मैं सफल-असफल होने को ध्यान में रखकर सवालों के जवाब नहीं देता। मेरा अपना आकलन है और मुझे अपने आकलन पर पूरा भरोसा है। कतिपय भिन्न परिस्थितयों के कारण आकलन में थोड़ी-बहुत हेरफेर हो सकती है।
आप हस्तरेखा विज्ञान के विशेषज्ञ होने के साथ-साथ जाने-माने आयुर्वेदाचार्य भी हैं। क्या इन दोनों में कोई परस्पर संबंध है?
हमारे ऋषियों ने लिखा है कि आयुर्वेद और हस्तरेखा विज्ञान की निदान प्रक्रिया में बहुत समानता है। आयुर्वेद में नाड़ी परीक्षण से जानते हैं कि शरीर में कफ, वात, पित्त में से कौन सा दोष है, जबकि हस्तरेखा विज्ञान में हथेली का रंग देखकर हम स्वास्थ्य के बारे में जान सकते हैं। जैसे हथेली का रंग सफेद हो तो मनुष्य में कफ की प्रधानता है। उसे दही, मैदा, मिठाई, आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक का सेवन नहीं करना चाहिए। इसी तरह हथेली का रंग पीला है तो पित्त की प्रधानता है। उन्हें चाय, सिगरेट, तंबाकू, मिर्च, मसाले आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। यदि हथेली का रंग मटमैला है तो वह हथेली वायु विकार का संकेत देती है। दोनों पद्धतियों में विभेद है, लेकिन निदान प्रक्रिया समान होने की वजह से काफी समानताएं भी हैं। मैंने दोनों का अध्ययन किया है और जाना है कि वर्तमान एवं भावी रोगों के निदान एवं बचाव के लिए कारगर कदम क्या हो सकते हैं।


!!.....As your feelings sharing here....!!