Saturday, December 12, 2020

बाजार डर बेचता है?

सौर मंडल में ग्रहण की स्थिति कुछ भी रहे लेकिन मन में ग्रहण नहीं लगना  चाहिए सौर मंडल में जो चंद्रमा है वो हमारा मन है और राहु भय  और अंधकार का प्रतीक   है तो जब भी हम भय का शिकार होते  है अज्ञान का शिकार होते हैं चिंता का शिकार होते हैं स्ट्रेस का शिकार होते हैं तो हमारी अंदर ग्रहण शुरू हो जाता है..  हम  चंद्र ग्रहण की परवाह करते हैं लेकिन अपने  मन ग्रहण की कभी परवाह नहीं करती है चंद्र ग्रहण महीने में 3 बार लगा  तो  हमारी चिंता का विषय बन जाता है लेकिन मन में ग्रहण महीने में 30 बार लगते हैं तब हमें चिंता नहीं होती जबकि उसकी ज़्यादा चिंता होनी चाहिए जिन्हें पृथ्वी में रहना है उन्हें ये सब सहना  होगा। #BestPalmistinIndia 
हमारे ऋषियों ने कहा है कि यत पिंडे तत  ब्रह्माण्डे  यानी जो हमारी अंदर है  वही बाहर ब्रह्माण्ड में है इसलिए जो अंदर सब चीज़ों को देख लेता है जो बाहर की सभी चीज़ों से मुक्त हो जाता है क्योंकि बाहर जो भी दिखता है संसार में वह हमारे अंदर  मौजूद है।   इसलिए ज्ञानियों ने कहा है कि सत्य बाहर नहीं भीतर है।  #HandReading
लेकिन भय चूँकि बिकता है भय  बिकाऊ है भय  बहुत बड़ा बाज़ार खड़ा करता है इस लिहाज़ से जब वैश्विक भय  का वातावरण है ऐसे में डॉक्टर, ज्योतिषी ,,सरकार बाज़ार सब भय  का दोहन करने में जुट गए हैं।   वर्तमान में कितना बड़ा बाज़ार खड़ा हो गया है ये हमें दिखाई नहीं देता है। #Palmistry
 
ये सच है कि करोना आख़री  संकट नहीं है लेकिन इससे कितना डरा जाए ये आपको तय करना होगा हाथ धोना ,मास्क लगाना , दूरी रखना इसके बावजूद भी तो डरना है ये आपको  समझने की बात यह है कि वायरस को मृत्यु का पर्याय न बनाएँ।  सावधानी और डर में फ़रक  लोगों को बताएँ आज चाहे सूर्यग्रहण चाहे   चंद्र ग्रहण लोगों सब डरावने हो गए हैं लेकिन सबसे डरावना है बाज़ार।  जहाँ सोच सिर्फ़ उपभोक्तावादी है यानी कि इस डर से क्या क्या  बिक सकता है  के अलावा कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है ऐसे में ज़रूरत से सावधान रहने की जागरूक रहने की प्रकाश में रहने की।  अंधकार ,  उदासी,  डिप्रेशन ,अज्ञान और डर को छोड़ देंगे  और ये तभी होगा जब अपना दीपक ख़ुद बन जायेंगे । #LivePalmReading 

Wednesday, January 4, 2017





आदिकाल से ही मनुष्य   के मन में आने वाले समय यानि भविष्य को जानने की जिज्ञासी रही है।  हर मनुष्य जानना चाहता है की कल क्या होगा? या आज जो मैं कर्म कर रहा हूँ उसका परिणाम क्या होगा ? कर्म तो हर आदमी करता है लेकिन फल कब मिलेगा ? इन्ही सवालों का जवाब हमें मिलता है ज्योतिषशास्त्र  में। 

ज्योतिष  वेद का तीसरा नेत्र है। ज्योतिषीय  गणनाएं शुद्ध गणित पर आधारित हैं जिनका लोहा आज के वैज्ञानिक भी मानते हैं।  चाहे चंद्रग्रहण , सूर्य ग्रहण जैसी खगोलीय घटनाएं हो या किसी का व्यक्तिगत जन्माङ्क  बना हो हमारे विद्वान ज्योतिषाचार्यों द्वारा बनाये गए  पंचांङग  कभी भूल चूक नहीं करते है। 
  लेकिन जब किसी  मनुष्य को अपना जन्म समय ज्ञात न हो तो जन्मकुंडली बनाना  एवं उसके बारे में कुछ बता पाना  लगभग असंभव हो जाता है। ऐसा केवल तभी होता है जब लोग केवल  जन्मकुंडली को ही ज्योतिष समझ लेते हैं।  जन्मकुंडली के अलावा हस्तरेखा विज्ञानं है जो आपके हाथ की लकीरों में ही आपकी जन्मकुंडली दिखा देता है। फिर अंक विज्ञानं है और मुखाकृति विज्ञानं के अलावा अनेक माध्यम हैं जिनसे आपके भाग्य की झलक मिल जाती है. लेकिन हस्तरेखा विज्ञानं आज अपनी उन्नत अवस्था में है और आपके जीवन की हर घटना का विस्तृत व्योरा देने में सक्षम है। आपका स्वभाव , आपका स्वास्थ्य, आपके सम्बन्ध कैसे रहेंगे ? आप अपना व्यवहार कैसा रखें ? समय  समय पर अपना हाथ  देखकर या  दिखाकर समय  के अनुसार  चलना  हम सीख सकते हैं। इसीलिए   हमारे  ऋषियों ने सुबह सबसे  पहले अपना हाथ देखने की शिक्षा दी-


 कराग्रे बसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती। 
करमूले तु  गोविंद प्रभाते कर दर्शनम। ।

क्योंकि हमारे हथेली के रंग एवं प्रभाव रेखाओ में होने वाले परिवर्तन हमारे आने वाले  समय  में  सुख एवं दुखों के संकेत लिए होते हैं और जो इन संकेतों को समय रहते समझ लेते हैं वे दुखों से काफी हद तक बचने में कामयाब हो जाते हैं। 

ज्योतिष को सिर्फ भविष्य बताने का माध्यम समझना ऐसी ही भूल होगी जैसी जीवन का उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना है। जीवन में सेवा, सत्संग,  परोपकार, ध्यान, संगीत , प्रकृति , चित्रकारी और पर्यटन को छोड़कर  सिर्फ पैसा पैसा कमाना, पैसे के पीछे भागना, पैसे के लिए सम्बन्ध बनाना , पैसे के लिए यात्रा करना , केवल पैसे का ही चिंतन करना मनुष्य को वास्तविक सुख से दूर ले जाता है।
  ज्योतिष हमें सिखाता है की अगर अच्छे फल पाना है तो पहले अच्छे कर्म करने होंगे।  अच्छे सम्बन्ध बनाने होंगे सबके हितों का ध्यान रखना होगा चाहे वे मित्र हों, रिश्तेदार हो, पडोसी हों, संसार हों ,जिव जंतु, पशु पक्षी, चाँद तारे , नदियां पर्वत  सबसे संवाद बनाये रखकर सबके हित की बात सोचकर ही सबमे परमात्म भाव रखकर ही हम इस संसार में सुखी रह सकते हैं। इसलिए हमने रिश्तों को ग्रहों से जोड़ा सूर्य पिता, चन्द्रमा माता, मंगल भाई, बुध बहन , तुलसी , पीपल,  गौमाता , चिड़िया ,चींटी , नदी, पर्वत आकाश सबकी पूजा करना सबको प्रशन्न  रखना सिखाया इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है मनुष्य के सुख से रहने का। 

ज्योतिष में मुहूर्त और नक्षत्र का चिंतन बहुत वैज्ञानिक है ।लेकिन उससे भी ज्यादा महत्व इस बात का है कि इससे हमें टाइम मैनेजमेंट और अनुशाशन सीखने को मिलता है। अगर हमे कोई  छूट देदे की अगले सप्ताह में कभी भी इंटरव्यू के लिए आ जाना तो शायद पूरा सप्ताह निकल जाये और हमें समय न मिले लेकिन अगर पंडित जी बता दें की सोमवार सुबह १०.१० से १०. ५५ के बीच शुभ मुहूर्त है इस बीच इंटरव्यू देने से सम्पूर्ण  सफलता मिलेगी तो हमारा उत्साह बढ़ जाता है, आलस्य ख़त्म हो जाता है हम ज्यादा एकाग्रता से काम करते हैं। इसी तरह हमारी बुरी आदतें 
ग्रहों को प्रशन्न करने के लिए किये गए उपायों, नियमो के दौरान छूट  जाती हैं।  

 चर्चा  चाहे रेडियो में चले या टीवी  में, मैं हमेशा कहता हूँ की ज्योतिष की ताकत को अभी तक  पहचाना नहीं गया. यह ऐसी पवित्र विद्या है जो न सिर्फ मनुष्य को नैतिक पतन से बल्कि सामाजिक बुराईयों से दूर रखने की क्षमता रखती है।  ज्योतिष के सही प्रयोग से एक अच्छे व्यक्ति एवं श्रेष्ठ समाज का निर्माण संभव है। बच्चों का हाथ देखकर बचपन में ही आगाह किया जा सकता है की इन्हें किन बुराईयों से बचाना है या इनमे कौन से गुण हैं जो इन्हें विश्वव्यापी शोहरत दिलाएंगे ? हमारे शोध जिस गति से जारी हैं मुझे आशा है की जिस तरह हम बच्चों के आँखों की जाँच करते हैं, दाँतों की जाँच करते हैं उसी प्रकार उनके हाथों की जाँच कराएँगे और उन्हें बेहतर इंसान बनाएंगे। 

ज्योतिष का सर्वाधिक नुक्सान ३  तरह के लोगो ने किया है एक वे जिन्होंने ज्योतिष का बिना अध्ययन किये ही उसे अन्धविश्वास मान लिया और दुसरे वे जिन्होंने अध्ययन तो किया लेकिन 
उसके बारे में लोगो समझाया नहीं , संकोची और अंतर्मुखी  स्वाभाव होने के कारन  तथ्यों को समाज के सामने सही तरीके से प्रस्तुत नहीं कर पाए  .  और तीसरे वे जो केवल एक दो किताबें पढ़कर   अपना व्यवसाय बढ़ाते रहे और  रत्न, ताबीज़ छल्ले,  जैसे प्रोडक्ट बेचते रहे। ज्योतिष उपासना का विषय है  बिना संयम, सेवाभावना  एवं इष्टकृपा के इसके गूढ़ रहस्यों को नहीं समझा  जा सकता है। यद्यपि सच्चे उपासकों को भौतिक आवश्यकताएं  भी पूरी  हो जाती है लेकिन यह उसका उद्देश्य नहीं होता। 

ज्योतिष का आकाश  बहुत बृहत एवं विशाल है ज्योतिष कहता है की हम पूरे ब्रम्हांड से जुड़े हैं कुछ भी अलग नहीं है "यत पिंड तत ब्रह्माण्डे । बाहर  सारे ब्रम्हांड में जो कुछ भी है  वह सब हमारे अंदर भी है अतः बाहर  संसार में किया गया कोई भी असत्य, अन्याय, विध्वंश से हम अछूते नहीं रह सकते अतः हम अपने मन, वचन, कर्म को सही दिशा दें तभी हम उज्जवल भविष्य की रचना कर सकते हैं। सारे संसार के नोट भी  हमारे अकाउंट में आ जाएँ तो भी हम सुखी नहीं हो सकते हैं अगर कोई  मनुष्य भूखा सो रहा है हमारे  आसपास।

, ज्योतिष कहती है कि अगर दुखी हो 
 शनि से पीड़ित हो तो जाकर भूखे को भोजन कराओ।  यानि संतुलन लाओ असंतुलन से दुखी हो। तराजू एक तरफ झुक जा रहा है इसलिए पीड़ा है अतः दुसरे पलड़े में कुछ रखो संतुलन आएगा तो सुख आएगा  यही तो शनि का काम है न्याय करना। न्याय के देवता शनि हैं तराजू लेकर खड़े हैं।  यह तो सामाजिक संतुलन की बात है अगर आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो ज्योतिष कहती है 
कि तुम्हे चिंता की जरूरत नहीं है अपना कर्म करते रहो यह संसार जिस शक्ति से चल रहा है वह तुम्हे भी संभाल लेगी तुम कुछ भी नहीं हो जो शक्ति सूर्य के ताप को नियंत्रित रखती है और समुद्र को  सीमाओं में रखती है पहाड़ों को स्थिर रखती है और आसमान से  विशाल ग्रहों और तारों को तुम्हारे ऊपर गिरने नहीं देती सम्हाल लेती है वही शक्ति तुम्हे भी संम्हाल लेगी। तुम शांति से अपना काम करो , होशपूर्ण बने रहो और जीवन का आनन्द लो और उस शक्ति (परमात्मा ) का धन्यवाद व्यक्त करो। 

Tuesday, July 7, 2015

DU Appreciation.

http://www.du.ac.in/du/uploads/Gandhi%20Bhawan/30062015_GB.pdf

My special talk on #yoga & #Ayurveda is being appreciated by #DelhiUniversity website follow link refer page 4.
Thanks to all.

Friday, June 26, 2015

दिल्ली में आयोजित हुई योग एवं आयुर्वेद कार्यशाला सम्पन्न


Date: June 01, 2015in: हेल्थ0 Comments103 Views
दिल्ली में आयोजित हुई योग एवं आयुर्वेद कार्यशाला सम्पन्न Current Crime+1Current Crime0 
कुलपति श्री दिनेश सिंह, पोफेसर अनीता शर्मा, प्रो चक्रवर्ती सहित अनेक शिक्षा विद एवं छात्रों ने भाग लिया

नई दिल्ली। मुख्या वक्त के रूप में  बोलते हुए डॉ लक्ष्मीकान्त  त्रिपाठी ने कहा कि आयुर्वेद दुनिया की सबसे प्राचीन चिकित्सा पध्यति  है इसमे न सिर्फ रोगो के बारे में , बल्कि रोगो से बचाव उनके उपचार अवं दीर्घायु के बारे में विस्तार से बताया गया है आहार निद्रा अवं बृह्मचर्य के नियमो  का पालन करके मनुष्य १०० वर्ष तक स्वस्थ्य अवं निरोग रह सकता है. आयुर्वेदा का अर्थ है- आयु= जीवन , वेद = ज्ञान  यानि जीवन को निरोग दीर्घायु अवं सार्थक बनाने का जो भी ज्ञान है वह सब हमें आयुर्वेदा से मिलता है। (latest health hindi news in delhi ncr)
आयुर्वेदा के अनुसार हमारा शरीर ३ दोषो से मिलकर बना है १ वात  २ पित्त ३ कफ    इन तीनो का समान यानि संतुलित होना ही स्वास्थ्य कहलाता है और इनका असंतुलित यानि दूषित होना ही बीमारियो का कारन बनता है इसीलिए इन्हे त्रिदोष कहा जाता है.
जिनकी वायु प्रकृति है उन्हें जोड़ो में दर्द सर दर्द पेट में गैस जल्दी होतीहै उन्हें गरिष्ठ बासी भोजन नहीं लेना चाहिए  से और ताज़ा भोजन लेना चाहिए  व्यायाम  सैर और प्राणायाम करना चाहिए  पित्त प्रकृति है उन्हें ज्वर जलन चक्कर फोड़े  जल्दी होते हैं
अतः उन्हें चाय सिगरेट शराब काफी धुप अग्नि का सेवन नहीं करना चाहिए  पानी और फलो का सेवन ज्यादा करना चाहिए  जिनकी कफ प्रकृति है उन्हें सर्दी खांसी सूजन मोटापा पाइल्स जल्दी होती है अतः उन्हें दही आइसक्रीम मैदा मिठाई पकवान कम खाना चाहिए.

योग और आयुर्वेद में बहुत समानता है दोनों  का उद्गम भारत में हुआ दोनों मनुष्य की शुद्धि अवं विकास पर जोर देते है ( प्रशन्न आत्मेन्द्रियमनश्च ) आयुर्वेदा शरीर की शुद्धि  पंचकर्म से और योग ख्टकर्म से करता है अष्टांग आयुर्वेद के भी हैं और अष्टांग योग भी है.
आयुर्वेद में आहार- यानि खाना क्या खाएं कब खाए कैसे खाएं और विहार- यानि दिनचर्या अवं व्यायाम पर बहुत जोर देता है और योग भी
युक्ताहार विहारस्य युक्तचेस्टस्य कर्मसु.
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवतु दुःखहा। ।

यानि समान सिद्धांतों और निर्देशो के साथ आयुर्वेद और योग हमारे जीवन को सार्थक स्वस्थ अवं निरोग बनाने का वचन देते हैं.
आज की भागदौड़ तनाव प्रतिश्पर्धा भरी जिंदगी में जब शुगर, ह्रदय रोग, अवं डिप्रेशन महामारी का रूप ले रहे है आयुर्वेद और योग मनुष्य जाति के लिए वरदान है और यह सौभाग्य का विषय है की सरकार और सारे विश्व में आज इसके महत्व को पहचाना गया है लेकिन उससे भी जरूरी है की हम सब प्रकृति के प्रति जागरूक हों और जिन ५ तत्वों से हमारा निर्माण हुआ है पृथ्वी जल वायु अग्नि आकाश  उन्हें नष्ट  होने से प्रदूषित होने से बचाएं तभी आशा रखें की हम भी  बचे रहेंगे।
कार्यशाला का समापन करते हुए विवि के कुलपति श्री दिनेश सिंह ने सभी से योग अवं आयुर्वेद को अपनाने का आह्वान किया उन्होंने कहा की डॉ लक्ष्मी कान्त त्रिपाठी में निष्काम सेवा की प्रवृति है और उनकी पुस्तक ‘जीते रहो’  मानव जीवन का स्पष्ट मैप है।

Tuesday, June 9, 2015

योगो भवति दुःखहा।

२९ मई २०१५ को  योग एवं आयुर्वेद पर कार्यशाला सम्पन्न हुई जिसमें कुलपति श्री दिनेश सिंह पोफेसर अनीता शर्मा प्रो चक्रवर्ती सहित अनेक शिक्षा विद एवं छात्रों ने भाग लिया. 

मुख्य वक्ता के रूप में  बोलते हुए डॉ लक्ष्मीकान्त  त्रिपाठी ने कहा कि आयुर्वेद दुनिया की सबसे प्राचीन चिकित्सा पध्यति  है इसमे न सिर्फ रोगो के बारे में ,
बल्कि रोगो से बचाव उनके उपचार अवं दीर्घायु के बारे में विस्तार से बताया गया है आहार निद्रा अवं बृह्मचर्य के नियमो  का पालन करके मनुष्य १०० वर्ष तक स्वस्थ्य अवं निरोग रह सकता है. आयुर्वेदा का अर्थ है- आयु= जीवन , वेद = ज्ञान  यानि जीवन को निरोग दीर्घायु अवं सार्थक बनाने का जो भी ज्ञान है वह सब हमें आयुर्वेदा से मिलता है।
आयुर्वेदा के अनुसार हमारा शरीर ३ दोषो से मिलकर बना है १ वात  २ पित्त ३ कफ    इन तीनो का समान यानि संतुलित होना ही स्वास्थ्य कहलाता है और इनका असंतुलित यानि दूषित होना ही बीमारियो का कारन बनता है इसीलिए इन्हे त्रिदोष कहा जाता है.
जिनकी वायु प्रकृति है उन्हें जोड़ो में दर्द सर दर्द पेट में गैस जल्दी होतीहै उन्हें गरिष्ठ बासी भोजन नहीं लेना चाहिए  से और ताज़ा भोजन लेना चाहिए  व्यायाम  सैर और प्राणायाम करना चाहिए  पित्त प्रकृति है उन्हें ज्वर जलन चक्कर फोड़े  जल्दी होते हैं
अतः उन्हें चाय सिगरेट शराब काफी धुप अग्नि का सेवन नहीं करना चाहिए  पानी और फलो का सेवन ज्यादा करना चाहिए  जिनकी कफ प्रकृति है उन्हें सर्दी खांसी सूजन मोटापा पाइल्स जल्दी होती है अतः उन्हें दही आइसक्रीम मैदा मिठाई पकवान कम खाना चाहिए.

योग और आयुर्वेद में बहुत समानता है दोनों  का उद्गम भारत में हुआ दोनों मनुष्य की शुद्धि अवं विकास पर जोर देते है ( प्रशन्न आत्मेन्द्रियमनश्च ) आयुर्वेदा शरीर की शुद्धि  पंचकर्म से और योग ख्टकर्म से करता है अष्टांग आयुर्वेद के भी हैं और अष्टांग योग भी है.
आयुर्वेद में आहार- यानि खाना क्या खाएं कब खाए कैसे खाएं और विहार- यानि दिनचर्या अवं व्यायाम पर बहुत जोर देता है और योग भी
युक्ताहार विहारस्य युक्तचेस्टस्य कर्मसु. 
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवतु दुःखहा। ।

यानि समान सिद्धांतों और निर्देशो के साथ आयुर्वेद और योग हमारे जीवन को सार्थक स्वस्थ अवं निरोग बनाने का वचन देते हैं.
आज की भागदौड़ तनाव प्रतिश्पर्धा भरी जिंदगी में जब शुगर, ह्रदय रोग, अवं डिप्रेशन महामारी का रूप ले रहे है आयुर्वेद और योग मनुष्य जाति के लिए वरदान है और यह सौभाग्य का विषय है की सरकार और सारे विश्व में आज इसके महत्व को पहचाना गया है लेकिन उससे भी जरूरी है की हम सब प्रकृति के प्रति जागरूक हों और जिन ५ तत्वों से हमारा निर्माण हुआ है पृथ्वी जल वायु अग्नि आकाश  उन्हें नष्ट  होने से प्रदूषित होने से बचाएं तभी आशा रखें की हम भी  बचे रहेंगे।
कार्यशाला का समापन करते हुए विवि के कुलपति श्री दिनेश सिंह ने सभी से योग अवं आयुर्वेद को अपनाने का आह्वान किया उन्होंने कहा की डॉ लक्ष्मी कान्त त्रिपाठी में निष्काम सेवा की प्रवृति है और उनकी पुस्तक 'जीते रहो'  मानव जीवन का स्पष्ट मैप है।
    
--

अमृता प्रीतम जी की कलम से

उनकी पत्रिका नागमणि में प्रकाशित यादगार पल

एवं इमरोज़ जी का बनाया रेखाचित्र 1998

विस्तृत विवरण उनकी कालजयी कृति 'काया के दामन में'

Tuesday, June 7, 2011

swami ramdev is also responsible for result!

स्वामी रामदेव जी की हथेली कि रेखाओ के आधार पर उनके जीवन पर एक दृष्टि--

बाबा का हाथ छोटा नुकीला अध्यात्मिक श्रेणी का है , भाग्य रेखा प्रारंभ में मोटी है-
साधारण परिवार में जन्मा लेकर संघर्षपूर्ण जीवन बिताने के बोजूद बाबा राम देव बहुत योग्य लोकप्रिय दयालु एवं बाल स्वाभाव के है. उनकी सरलता ने उन्हें ऊँचा मुकाम दिया है. उनके व्यक्तित्वा में संतो से अधिक तेज और राजनेताओ से भी अधिक जनप्रियता एवं सर्व स्वीकार्यता है.


बाबा कि हथेली में सूर्य क्षेत्र बलवान है, सूर्य रेखा भी लम्बी है- लेकिन गुरु , शनि कि और झुका है- चन्द्र अति विकसित है-
आज देश का कोई भी नेता इतनी भीड़ नहीं जुटा सकता है. वे बहुत अच्छे teamleader है.
उनके अंदर आत्मा प्रशंशा एवं लोककल्यान का भाव है. लेकिन नेत्रत्वा के गुणों का भाव है.
बाबा दिवस्वप्नादर्शी एवं घोर महत्वाकंशी हैं. बाबा कि सफलता के पीछे उनके ज्ञान कि कम विज्ञापन की भूमिका ज्यादा है,.

ह्रदय रेखा लम्बी है, हेड लाइन सीधी है- लाइफ लाइन से जुडी है, रातोंरात सब क़र जाना चाहते है -
वे आदर्शवादी है और सबका भला करना चाहते है लेकिन कैसे करें यह पता नहीं है.
भावनाओ कि नदी में बह जाते हैं.


अंगूठा लम्बा लेकिन पतला है ,तर्क शक्ति बेहतर है बोलते ज्यादा हैं सुनते कम है
वे देशप्रेम एवं राष्ट्र प्रेम का नाम लेकर बहुत बडा परिवर्तन लाना चाहते हैं , लेकिन उनको पूरा करने के लिए जीस साहस एवं त्याग कि जरूरत होती है उसकी उनमे कमी है. वे नाम भगत सिंह जैसा करना चाहते हैं लेकिन परिणाम से डरते हैं.( अपने अनुयायियों को अकेले छोड़कर, महिलाओ के कपडे पहनकर भाग जाना , और कहना मेरा एन्कोउन्टर हो जाता? अगर संकल्प लिया हैं तो त्याग भी करना होता है, सन्यासी को जीवन से कैसा मोह.)

४२ वे साल भाग्य में परिवर्तन सन्यास (शनि) से संसार ( गुरु ) कि ओर-
बाबा के जीवन में बहुत बडा change आया है वे धर्मगुरु से जननेता में बदल चुके है. उनको जल्दी अपनी भूमिका स्पष्ट करनी होगी अन्यथा
इमागे ख़राब होगी और जनाधार खिसकेगा. निष्कासित एवं परित्यक्ता लोगो को अपना सलाहकार बना उन्हें महंगा पड़ा.

हथेली में गुरुवालय है और ह्रदय और मष्तिष्क रेखा के बीच दूरी सामान है ( रोयल लाइफ)-
उनके हाथ में खुद किंग बन्ने का योग नहीं है लेकिन आगे भी वे किंग बनाते रहेंगे..उनके सहयोग से सरकारे बनेगी और बिगड़ेगी.
अगर पूरा विश्लेषण किया जाये तो ४ जून के बाद बाबा का demotion हुआ है . उन्होंने सहस विवेक और धैर्य से काम लिया होता तो उनकी तस्वीर और चमकीली दिखाई देती. आगे उन्हें सुरक्षा एवं स्वस्थ्य के पत\रति सतर्क रहना होगा.

बाबा रामदेव के उज्जवल भविष्य एवं प्रगति कि शुभकामनाओ के साथ .

सादर,
Dr. L K Tripathi