Saturday, June 15, 2013

अच्छी सोच ही प्रार्थना और अच्छा कर्म ही पूजा है
                    --डा लक्ष्मीकान्त त्रिपाठी

आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।
पञचैतानि विलिखयन्ते गर्भस्थस्येव देहिनाः।।
अर्थात मां के गर्भ के दौरान ही हाथ की लकीरों के रूप में यह अंकित हो जाता है कि मनुष्य की आयु कितनी होगी, धन और विद्या कितनी मिलेगी, कर्म क्या होंगे एवं मृत्यु कैसे होगी। ऐेसी ही हाथ की लकीरों की शक्ति। डा’. लक्ष्मीकांत त्रिपाठी हस्तरेखा विज्ञान में अपनी धाक जमा चुके हैं। उन्होंने अनगिनत लोगों को उनकी हाथ की लकीरों के आधार पर जीवन में सफलता की राह दिखाई है। डा’ त्रिपाठी हस्तरेखा विज्ञान के साथ-साथ आयुर्वेद में भी महारथ रखते हैं। उन्होंने इन दोनों विधाओं में ऐसा तादाम्य स्थापित कर दिया है कि उनके पास आने वाले सभी लोगों को भौतिक सफलताओं के साथ-साथ बेहतर स्वास्थ्य का मंत्र भी मिल जाता है। पेश हैं उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

प्रगतिशील कहे जाने वाले लोग तर्क और विज्ञान के आधार पर हस्तरेखा विज्ञान को ही नकारते हैं। उनकी दलील है कि घटनाओं की भविष्यवाणी कैसे की जा सकती है।
ऐसे विचार उन लोगों के हैं जो ज्योतिष को सिर्फ भविष्यवाणी से जोड़कर देखते हैं। ज्योतिष का यह मतलब कदापि नहीं है कि आप यह बता दें कि अगले क्षण क्या होने वाला है? यह तो सिर्फ परमात्मा ही जानते हैं कि अगले क्षण क्या होने वाला है। जिस प्रकार विज्ञान, चिकित्सा समेत अन्य अनेक क्षेत्रों में सफलता की अपनी सीमाएं, गलती की गुंजाइश है उसी तरह ज्योतिष में भी अनुमान, आकलन में कमी रह जाने की गुंजाइश है। हस्तरेखा विज्ञान मेरा विषय है, यह भविष्य को समझने और उसके अनुरूप अपने आपको तैयार करने की राह बताता है। आपकी हाथ की लकीरों में आपका व्यक्तित्व, आपका अतीत, वर्तमान और भविष्य छिपा है, बस समझने के लिए निरंतर अध्ययन एवं अनुसंधान की आवश्यकता है। मैं यही कोशिश करता हूं कि हाथ की लकीरों के आधार पर किसी व्यक्ति को सफलता की राह बता सकूं, उसकी परेशानियों का निदान कर सकूं।


हस्तरेखा विज्ञान के प्राचीन संदर्भ के बारे में कुछ बताइए।
प्राचीन काल से ही हाथ की लकीरें देखकर मनुष्य के स्वभाव, उसके आने वाले समय, स्वास्थ्य, संपन्नता एवं प्रगति के बारे में जानने की परंपरा रही है। पौराणिक काल में देवर्षि नारद शायद सबसे लोकप्रिय एवं सफल हस्तरेखा विज्ञानी थे। वे स्वयं लोगों के पास जाकर उनकी समस्याओं का समाधान बताते थे। इसके अलावा अग्नि पुराण, गरुण पुराण और पद्य पुराण में भी हाथ की लकीरों एवं मनुष्य के शरीर के लक्षणों के आधार पर उसके गुण-अवगुण जानने की जानकारी मिलती है। प्रत्येक आत्मा जब इस संसार में आती है या यह कहें कि मां के गर्भ में प्रवेश करती है तो उसका पूर्व संचित कर्मों के आधार पर एक संकल्प होता है। उस संकल्प के अनुरूप शिशु के हाथ की लकीरें आकार लेती हैं। रेखाएं दो प्रकार की होती हैं। एक प्रधान रेखाएं जो मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक वही रहती हैं, बदलती नहीं हैं और दूसरी प्रभाव रेखाएं जो समय-समय पर शिक्षा, सोच एवं अच्छे-बुरे कामों के आधार पर बदलती रहती हैं।
आज के परिप्रेक्ष्य में ज्योतिष विधा में क्या बदलाव की जरूरत है? मतलब आज की आधुनिकता में ज्योतिष जैसी प्राचीन विधा को किस तरह जोड़ना चाहेंगे?
समय के साथ समाज बदला, लेकिन ज्योतिष का तरीका नहीं बदला है। ज्योतिष की बुनियाद अभी भी वही है जो सदियों पहले थी। वैसे आज इको फ्रेंडली उपायों की ज्यादा जरूरत है। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश को शुद्ध एवं सुरक्षित रखने की जरूरत है। मनुष्य को ज्यादा से ज्यादा सोशल होने की आवश्यकता है। आज उपभोक्तावाद, पदार्थवाद का युग है। स्वार्थ, दिखावा, ढोंग, आधुनिकता के नाम पर नैतिक पतन बहुत बढ़ गया है। इन हालात में हम अपने सामान्य जीवन का मजा नहीं ले पा रहे हैं। बड़े लोग ही गलत राह पर जा रहे हैं। फिर भी मुझे संतोष मिलता है कि सही परामर्श से लोग लाभान्वित हो रहे हैं। लोग बिना अच्छे कर्म किए अच्छे फल पाना चाहते हैं। मैं उन्हें शुभ संकल्प की ओर आगे बढ़ाता हूं। सात्विकता को बढ़ावा देता हूं। 

ज्योतिष की मूल प्रेरणा क्या है? इसमें किस तरह के बदलाव की आवश्यक है और आप अपने अनुभव के आधार पर क्या संदेश देना चाहेंगे?
ज्योतिष का पहला सूत्र है-चरैवेति चरैवेति अर्थात चलते रहो चलते रहो, रुकना नहीं है। अतः ज्योतिषियों को भी अब देश काल के अनुसार अपने तौर-तरीके बदलने होंगे। पहली बात यह है कि कोई भी ग्रह कभी रुकता नहीं है, चलता ही रहता है। फिर वह चाहे सूर्य हो, चंद्र हो, गुरु हो या राहु हो। सब चल रहे हैं और मनुष्य को भी निरंतर चलते रहने की प्रेरणा दे रहे हैं। अतः रुकने का तो सवाल ही नहीं उठता। हां, किधर चलना है, यह एक सवाल हो सकता है और सफलता के लिए इसका उत्तर जानना जरूरी है। इसका उत्तर हाथ की लकीरों में मिलता है, जन्मांक से मिलता है। गुरु कहता है-शिक्षा, राजनीति, प्रशासन, प्रबंधन आपका क्षेत्र है। बुध कहता है-व्यापार एवं विज्ञान। सूर्य कहता है सृजन। मीडिया, ग्लैमर आपके क्षेत्र हो सकते हैं। शनि व चंद्रमा एकांत चिंतन की ओर उन्मुख करते हैं। शोध और एकांत चिंतन की राह इसी से खुलती है। यानी ये ग्रह भीड़ से अलग कुछ कर दिखाने की आवाज देते हैं। दूसरी बात जो हर ज्योतिषी को ध्यान देने की आवश्यकता है वह यह कि वे ऐसे उपाय बताएं जो पर्यावरण के अनुकूल हो, जो हमारी सृष्टि का संरक्षण करने वाले हों। यानी वायु, ध्वनि एवं जल प्रदूषण रोकने वाले हों। घर के भीतर, विशेषकर पति और पत्नी के बीच तनाव न उत्पन्न हो, सास और बहू के बीच नफरत न फैले। ज्योतिषियों को यह भी ध्यान रखना होगा कि हमारे समाज में युवा संस्कारित हों। इसलिए वे ऐसे उपाय न बताएं जो संस्कारों की महत्ता घटाने वाले हों। अगर हमारे समाज के युवा संस्कारित होंगे तो हमारा समाज अवश्य उन्नति करेगा।
क्या ज्योतिष विद्या या हाथ की लकीरों के अध्ययन से ऐसे चमत्कार भी होते हैं कि कोई भी दुर्भाग्यशाली व्यक्ति भाग्यशाली बन जाए या कोई भी किस्मत वाला आदमी भी दर-दर की ठोकरें खाए?
नहीं, ज्योतिष के नाम पर चमत्कार दिखाने वाले लोगों को लक्ष्य से भटकाते हैं और ऐसे लोगों का शिकार वही बनते हैं जो बिना कर्म किए फल पाना चाहते हैं। इस विधा में निपुणता व्यक्ति की शिक्षा, तप, अभ्यास, त्याग और सेवा की भावना में निहित है। चमत्कार जैसा कुछ भी नहीं है। जिस तरह साइकिल-कार चलाना अथवा हवाई जहाज उड़ाना सीखने के लिए प्रशिक्षण, अभ्यास और अनुभव की जरूरत होती है ठीक उसी तरह हस्तरेखा विज्ञान से यह जाना जा सकता है कि किस समय कौन सा निर्णय सही होगा। हाथ की रेखाएं ईश्वर द्वारा बनाई गई जन्मकुंडली हैं। आपके जीवन का राजमार्ग आपकी रेखाओं के रूप में आपकी हथेली पर अंकित है। यह एक ऐसा मैप है जिससे न केवल आप अपनी मंजिल के बारे में जान सकते हैं, बल्कि वहां तक पहुंचने का सही प्लान भी तैयार कर सकते हैं।  
आप अपने खुद के यादगार अनुभवों के बारे में बताइए। खासकर उन अवसरों के बारे में जब आपको अपनी भविष्यवाणी सच साबित होने पर संतोष का अनुभव हुआ हो।
मेरे लिए ऐसे अवसरों की गिनती करना कठिन है, क्योंकि मैं रोज ही अनगिनत लोगों से मिलता हूं। उनके अपने अनुभव के आधार पर यह कह सकता हूं कि मैं अपने उद्देश्य यानी लोगों को उनकी मंजिल तक पहुंचाने, उन्हें सही राह दिखाने को पूरा करने की दिशा में ही काम कर रहा हूं। मेरे लिए यही संतोष काफी है।
बहुत से लोग कहते हैं कि हमने ज्योतिष की ढेरों किताबें पढ़ी हैं, लेकिन जब भाग्य बतातें हैं तो वह सही नहीं होता।
ढेरों किताबें पढ़ लेने से कोई ज्योतिषी नहीं बन जाता। सच तो यह है कि ऐसे अधिकांश लोग ज्योतिष का इस्तेमाल अपने हितों को पूरा करने के लिए करते हैं। जो लोग लोग ज्योतिष की आत्मा से परिचित हैं वे कभी यह दावा नहीं करेंगे कि मैं सब कुछ बता सकता हूं कि कल क्या होने वाला है? दरअसल जिन लोगों ने ज्योतिष के बारे में अधकचरा ज्ञान हासिल किया था उन्होंने ही इस विधा की गरिमा गिराने का काम किया है। हस्तरेखा विज्ञान ज्योतिष से कुछ भिन्न है। हमें इसके अंतर को समझना होगा। हस्तरेखा विज्ञान में भविष्य का आकलन हाथों की लकीरों के जरिये किया जाता है। महत्वपूर्ण है उस सूत्र को पकड़ना जो हाथों की लकीरों में छिपा है।
क्या आपको कभी यह भय नहीं महसूस होता कि अगर आपकी कोई भविष्यवाणी गलत साबित हो गई तो इसका कैसा प्रभाव पडे़गा। 
नहीं, मुझे कभी इसका भय नहीं रहा, क्योंकि मैं हस्तरेखा विज्ञान की ताकत से परिचित हूं। जाने-अनजाने अनेक लोग समय-समय पर मेरी परीक्षा लेते रहे हैं। आपको एक वाकया बताता हूं। टेलीविजन चैनल स्टार न्यूज पर सूर्यग्रहण को लेकर एक महाबहस चल रही थी। उस बहस में ज्योतिष से जुड़े हुए लोग भी थे और विज्ञान व तर्कशास्त्र से जुड़े लोग भी। इस महाबहस के दौरान विज्ञान और तर्कशास्त्र के लोग एक प्रकार से ज्योतिष विधा का ही निरादर कर रहे थे। महाबहस के दौरान एक ऐसा समय भी आया जब एंकर दीपक चौरसिया ने वैज्ञानिकों और तर्कशास्त्रियों को संतुष्ट करने के लिए मुझसे अपने जीवन के बारे में अनेक ऐसी चीजें पूछीं जिनके बारे में सिर्फ वही जानते थे। यह लाइव महाबहस पूरे देश में देखी जा रही थी। मैं तब भी भयभीत नहीं हुआ और उनके हाथों की लकीरों के आधार पर उनके सवालों के जवाब देता रहा। सभी जवाब सही थे। खुद दीपक चौरसिया ने इसकी पुष्टि की। कहने का मतलब यह है कि मैं सफल-असफल होने को ध्यान में रखकर सवालों के जवाब नहीं देता। मेरा अपना आकलन है और मुझे अपने आकलन पर पूरा भरोसा है। कतिपय भिन्न परिस्थितयों के कारण आकलन में थोड़ी-बहुत हेरफेर हो सकती है।
आप हस्तरेखा विज्ञान के विशेषज्ञ होने के साथ-साथ जाने-माने आयुर्वेदाचार्य भी हैं। क्या इन दोनों में कोई परस्पर संबंध है?
हमारे ऋषियों ने लिखा है कि आयुर्वेद और हस्तरेखा विज्ञान की निदान प्रक्रिया में बहुत समानता है। आयुर्वेद में नाड़ी परीक्षण से जानते हैं कि शरीर में कफ, वात, पित्त में से कौन सा दोष है, जबकि हस्तरेखा विज्ञान में हथेली का रंग देखकर हम स्वास्थ्य के बारे में जान सकते हैं। जैसे हथेली का रंग सफेद हो तो मनुष्य में कफ की प्रधानता है। उसे दही, मैदा, मिठाई, आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक का सेवन नहीं करना चाहिए। इसी तरह हथेली का रंग पीला है तो पित्त की प्रधानता है। उन्हें चाय, सिगरेट, तंबाकू, मिर्च, मसाले आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। यदि हथेली का रंग मटमैला है तो वह हथेली वायु विकार का संकेत देती है। दोनों पद्धतियों में विभेद है, लेकिन निदान प्रक्रिया समान होने की वजह से काफी समानताएं भी हैं। मैंने दोनों का अध्ययन किया है और जाना है कि वर्तमान एवं भावी रोगों के निदान एवं बचाव के लिए कारगर कदम क्या हो सकते हैं।


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(An interview on DD National)
                             (LIVE prediction with Mr.Deepak chaurasia   over STAR NEWS )

Thursday, June 6, 2013

कह हनुमंत विपत प्रभु सोई!
जब तब सुमिरन भजन न होई!!

प्रातः स्मरणीय गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं की श्री हनुमान जी ने कहा की, हे प्रभु राम ! विपतीय मनुष्य के जीवन में तभी अति हैं जब मनुष्य सुमिरन भजन नहीं करता है. 
क्या इसका मतलब यह है सीता जी से वियोग इसलिए हुआ की भगवन राम सुमिरन भजन नहीं करते थे , पूजा पथ नहीं करते थे?

इस पर विचार करना जरूरी है, क्योंकि सुमिरन का अर्थ है सीखना और भजन का अर्थ है
उसको जीवन में उतारना ! यानि जो भी हम सीखें उसे जीवन में, अपने आचरण में जरूर उतारे।

जैसे - आपको पता है सड़क पर बाएं चलना है , रेड लाइट पर रुकना है लेकिन यह ज्ञान पर्याप्त नहीं है यह तो सुमिरन हो गया इसका पालन भी जरूरी है यानि भजन. आपको
पता है मांसाहार धूम्रपान व्यभिचार गलत है -सुमिरन है लेकिन भजन न किया तो विपत्तिय आयेंगी ही!

भगवन को भी संकट झेलने पड़े क्योंकि पता था की सोने का मृग नहीं होता है लेकिन भजन नहीं किया , भूल गए की इसके पीछे नहीं भागना है ,

जीवन में सुमिरन के साथ भजन जरूर करें , मुझे लगता है भगवन ने अपनी लीला के माध्यम से यही सिखाने की कोशिश की है इस प्रसंग मे…………………….

बोलिए सियावर रामचंद्र जी की ! पवनसुत हनुमान जी की जय !!